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Class 12
PHYSICS
साइक्लोट्रॉन के कार्य करने के मूल सिद्धा...

साइक्लोट्रॉन के कार्य करने के मूल सिद्धांत का उल्लेख कीजिए । स्पष्ट कीजिए कि इसका उपयोग आवेशित कणों को त्वरित करने में कैसे किया जाता है । इसका के महत्वपूर्ण उपयोग लिखिए।

लिखित उत्तर

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उपयोग : त्वरित ऊर्जायुक्त कणों का नाभिक पर बमबारी करके नाभिकीय अभिक्रिया का अध्ययन करने में , रेडियोएक्टिव पदार्थ उत्पन्न करने में ।
यह एक ऐसी युक्ति है जिसका उपयोग प्रोटॉनों ,`alpha`- कणों , धन कणों आदि को त्वरित करने के लिये किया जाता है , साइक्लोट्रॉन कहलाता है । इसका निर्माण ई- लारेंस ने सन 1932 में किया था ।
1. मूल सिद्धांत - साइक्लोट्रॉन आवेशित कण के अनुप्रस्थ चुंबकीय क्षेत्र में गति पर आधारित है । जब कोई आवेशित कण एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में लंबवत गति करता है तथा विधुत क्षेत्र द्वारा लगातार त्वरित होता है , तो उसकी त्रिज्या क्रमश : बढ़ती जाती है । बढ़ती हुई त्रिज्या के सर्पिलाकार पथ का अनुसरण करता है तथा उसकी चाल लगातार बढ़ती चली जाती है ।
2. संरचना - चित्र के अनुसार साइक्लोट्रॉन में धातु के दो खोखले अर्द्ध बेलन होते है , जिन्हे ' डिज ' कहा जाता है । `D_(1)" और "D_(2)`को कुछ दूरी पर विस्थापित कर रखा जाता है ।

डिज के केंद्र पर एक धनायन स्रोत रखा जाता है जो सामान्यतः ड्यूटेरियम होता है , जिस पर उच्च ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉनों की बमबारी की जाती है ।
ये डिज एक शक्तिशाली विधुत चुम्बक के बीच रखे जाते है , जिससे कि विधुत चुम्बक से उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र डिज के लंबवत होता है । चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता 1 से 2 टेसला के बीच होती है ।
दोनों डिज को `10^(4) - 10^(5)`वोल्ट के क्रम के उच्च आवृत्ति वाले डोलित्र से जोड़ा जाता है । विधुत डोलित्र की आवृत्ति `10^(7)`हर्ट्ज के क्रम की होती है ।
इस पूरी व्यवस्था को एक निर्वात कक्ष में रखा जाता है , जहाँ पारे के `10^(-6)`मिमी क्रम का निर्वात होता है , जिससे त्वरित होने वाले आयनों का वायु अणुओं से संघट्ट न हो ।
3. सिद्धांत एवं क्रिया विधि - माना कि आयन स्रोत से किसी क्षण उत्पन्न कण का द्रव्यमान m एवं आवेश q है तथा इस क्षण `D_(1)` धनात्मक एवं `D_(2)` ऋणात्मक विभव पर है । अतः कण पर `D_(1)`के कारण विकर्षण एवं `D_(2)`के कारण आकर्षण बल लगेगा एवं आवेश `D_(2)` की ओर त्वरित गति करेगा । `D_(2)`में चूँकि यह अभिलंबवत चुम्बकीय क्षेत्र में प्रवेश करता है ,
अतः कण वृत्तीय पथ में नियत चाल में गति करेगा ।
जैसे ही कण `D_(2)`से बाहर निकलता है वैसे ही `D_(1)"एवं "D_(2)`के विभव परिवर्तित हो जाते है , अतः कण पर परिणामी बल `D_(1)` की ओर लगता है , जिससे कण पुनः त्वरित होता है
एवं अधिक वेग से `D_(1)`में प्रवेश करता है जिससे वृत्तीय पथ की त्रिज्या कुछ बढ़ जाती है । इस प्रकार इस प्रक्रिया की सतत पुनरावृत्ति होती है और दोनों D के बीच इसकी गतिज ऊर्जा बढ़ती जाती है । जब कण के पथ की त्रिज्या लगभग D की त्रिज्या के बराबर हो जाती है , तो इसे विक्षेपक की सहायता से बाहर निकाल लिया जाता है ।
माना कि किसी क्षण वृत्तीय पथ कि त्रिज्या r तथा कण कि चाल v है , तो चुंबकीय क्षेत्र के कारण कण पर लगने वाला लॉरेंज बल
` F = qv B sin 90^(@) = qv B`
जहाँ B विधुत चुम्बक द्वारा आरोपित चुम्बकीय क्षेत्र है यह बल कण को आवश्यक अभिकेंद्र बल प्रदान करता है , अतः
`qv B = (mv^(2))/r`
या `r = (mv)/(qB)` ...(1)
अर्थात कण के वृत्तीय पथ कि त्रिज्या उसके वेग के अनुक्रमानुपाती होती है ।
4. आवेशित कण का आवर्तकाल तथा प्राप्त अधिकतम गतिज ऊर्जा - माना आवेशित कण का आवर्तकाल T है , तब एक D को पार करने में लगा समय T/2 होगा । अतः
`T/2 = "दूरी"/" कण की चाल " = " अर्द्ध परिधि "/" चाल"`
` T/2 = (pir)/v = pi/v * (mv)/(qB)`
` rArr T = (2pi mv)/(vqB) = (2 pim)/(qB) ` ....(2)
साइक्लोट्रॉन में त्वरित कण की गतिज ऊर्जा अधिकतम तब होती है , जब कण के वृत्तीय पथ की त्रिज्या अधिकतम अर्थात D की त्रिज्या R के बराबर हो , क्योंकि इस स्थिति में चाल अधिकतम `(v_("max"))` होती है ।
` :. v_("max") = (qBR)/m`
( समी. 1 का उपयोग करने पर )
` :. ` अधिकतम गतिज ऊर्जा
`E_("max") = 1/2 mv _("max").^( 2)`
` = 1/2 m [(qBR)/m]^(2)`
` = (q^(2)B^(2)R^(2))/(2m) ` ...(3)
यही साइक्लोट्रॉन में त्वरित कण द्वारा प्राप्त अधिकतम गतिज ऊर्जा का व्यंजक है ।
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