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Class 12
PHYSICS
ट्रान्सफॉर्मर की कार्यविधि एवं सिद्धान्त...

ट्रान्सफॉर्मर की कार्यविधि एवं सिद्धान्त को नामांकित चित्र सहित समझाइए।

लिखित उत्तर

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नामांकित रेखाचित्र -

सिद्धान्त एवं कार्य-विधि-ट्रान्सफॉर्मर अन्योन्य प्रेरण के सिद्धान्त पर कार्य करता है। जब इसकी प्राथमिक कुण्डली के सिरों के मध्य प्रत्यावर्ती विभवान्तर लगाया जाता है, तो क्रोड में परिवर्ती चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। अत: प्रेरण की क्रिया से द्वितीयक कुण्डली में उसी आवृत्ति की प्रत्यावर्ती धारा उत्पन्न हो जाती है।
यदि ट्रान्सफॉर्मर की दक्षता 100% हो, तो प्राथमिक कुण्डली को दी गई सम्पूर्ण ऊर्जा द्वितीयक कुण्डली को प्राप्त हो जाती है।
`E_(p)xxI_(p)=E_(S)xxI_(S)`
या `(E_(S))/(E_(P))=(I_(P))/(I_(S))` ....(1)
जहाँ `E_(p)` = प्राथमिक कुण्डली के सिरों के मध्य विभवान्तर, `E_(S)` = द्वितीयक कुण्डली के सिरों के मध्य विभवान्तर, `I_(p)`= प्राथमिक कुण्डली में बहने वाली धारा, `I_(S)` = द्वितीयक कुण्डली में बहने वाली धारा |
यदि प्राथमिक कुण्डली में `N_(P)` चक्कर तथा द्वितीयक कुण्डली में `N_(S)` चक्कर (फेरे) हों, तो
`(E_(S))/(E_(P))=(N_(S))/(N_(P))` ...(2)
समी. (1) और (2) से स्पष्ट है कि यदि `E_(S) lt E_(p)`
तो `N_(S)lt N_(p)` तथा `I_(p) lt l_(S)`
अत : अपचार्यी ट्रान्सफॉर्मर (Eslt E,) की द्वितीयक कुण्डली में प्राथमिक कुण्डली की तुलना में चक्करों की संख्या कम होती है। अत: ट्रान्सफॉर्मर धारा की प्रबलता को बढ़ा देता है।
पुन: यदि `E_(S)gt E_(p)`
तो `N_(S)gt N_(p)` तथा `I_(p)gtI_(S)`-
अर्थात् उच्चायी ट्रान्सफॉर्मर की द्वितीयक कुण्डली में प्राथमिक कुण्डली की तुलना में चक्करों की संख्या अधिक होती है। अत: उच्चायी ट्रान्सफॉर्मर धारा की प्रबलता को बढ़ा देता है।
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