चित्र में B एक बैटरी, C एक संधारित्र तथा L एक प्रेरकत्व कुण्डली है। K, और K, दाब कुंजियाँ हैं।
जब दाब कुंजी `K_(1)` को दबाया जाता है तो संधारित्र C आवेशित होने लगता है और उसमें विद्युत्-कजा संचित होने लगती है [चित्र (a)]। जब संधारित्र पूर्णत: आवेशित हो जाता है तो दाब कुंजी `K_(1)` को छोड़कर दाब कुंजी `K_(2)` को दबाते है। जिससे प्रेरकत्व कुंण्डली L में से संधारित्र C विसर्जित होने लगता है।
जब C विसर्जित होता है, तो कुण्डली L में धारा बहने लगती है। अत: उसके चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है जिसके कारण कुण्डली में प्रेरित वि। वा। बल उत्पन्न हो जाता है जो धारा में वृद्धि का विरोध करता है। अत: संधारित्र को विसर्जित होने में कुछ समय लग जाता है। संधारित्र के विसर्जित होते समय उसमें संचित ऊर्जा क्रमश: कुण्डली में चुम्बकीय ऊर्जा के रूप में परिवर्तित होने लगती है और जब संधारित्र पूर्णतः विसर्जित हो जाता है तो विद्युत् ऊर्जा शून्य तथा चुम्बकीय ऊर्जा अधिकतम हो जाती है। [चित्र (b)]
ज्यों ही विसर्जन पूर्ण होता है, धारा का प्रवाह बन्द हो जाता है जिससे कुण्डली से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स कम होने लगता है। फलस्वरूप कुंडली में वि. वा. बल प्रेरित वि. वा. बल के कारण संधारित्र अब विपरीत दिशा में आवशित होने लगता है । इस प्रक्रिया में कुण्डली में संचित चुम्बकीय ऊर्जा क्रमश- संधारित्र में विद्यत ऊर्जा के रूप में परिवर्तित होने लगती है। यदि परिपथ का ओमीय प्रतिरोध शुन्य हो, तो संधारित्र प्रारम्भिक मान तक पुन: आवेशित हा जाता है और कुण्डली में संचित सम्पूर्ण ऊर्जा, विद्यत ऊर्जा के रूप में संधारित्र में संचित हो जाती है [चित्र (c)]।
अब संधारित्र विपरीत दिशा में विसाजत होता है तथा परिपथ में धारा भी विपरीत दिशा में शन्य से बढ़ने लगती है। जिसके कारण विद्युत् ऊर्जा, चुम्बकीय ऊर्जा के रूप में परिवर्तित होने लगती है। जब संधारित्र पूर्णत: विसर्जित हो जाता है, तो विद्युत् ऊर्जा शून्य तथा चुम्बकीय ऊर्जा अधिकतम हो जाती है [चित्र (d)]।
संधारित्र के पूर्णतः विसर्जित हो जाने पर कुण्डली से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स घटने लगता है जिससे अब संधारित्र पूर्व से विपरीत दिशा में आवेशित होने लगता है और चुम्बकीय ऊर्जा का विद्युत् ऊर्जा में रूपान्तरण होने लगता है [चित्र (e)] ।
इस प्रकार इस परिपथ में संधारित्र की विद्युत्-ऊर्जा कुण्डली की चुम्बकीय ऊर्जा में, तत्पश्चात् कुण्डली की चुम्बकीय ऊर्जा संधारित्र की विद्युत् ऊर्जा में परिवर्तित होने लगती है और आगे यही क्रिया जारी रहती है। जिससे L-C परिपथ में विद्युत् दोलन होने लगते हैं।
विद्युत्-चुम्बकीय दोलनों की आवृत्ति संधारित्र की धारिता C और कुंडली के प्रेरकत्व L पर निर्भर करती है। यदि परिपथ का ओमीय प्रतिरोध नगण्य हो, तो परिपथ में विद्युत्-चुम्बकीय दोलनों की आवृति समीकरण द्वारा दी जाती है-
यदि परिपथ का ओमीय प्रतिरोध शून्य है, तो ये विद्युत्-चुम्बकीय दोलन अनन्त काल तक चलते रहते हैं। किन्तु परिपथ का प्रतिरोध कभी भी शून्य नहीं हो सकता। परिपथ का कुछ न कुछ प्रतिरोध अवश्य होता है. जिसके कारण परिपथ की ऊर्जा का ऊष्मा ऊर्जा के रूप में क्षय होने लगता है। फलस्वरूप दोलनों का आयाम क्रमश: घटता जाता है और अन्त में शून्य हो जाता है। इस प्रकार के दोलनों को अवमन्दित दोलन कहते हैं।
यदि परिपथ को प्रति चक्र बाहर से उतनी ऊर्जा मिलती रहे जितनी कि क्षति होती है, तो दोलन का आयाम नियत रहता है।