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PHYSICS
P-N सन्धि से क्या अभिप्राय है ? चित्र खी...

P-N सन्धि से क्या अभिप्राय है ? चित्र खींचकर P-N सन्धि के संदर्भ में निम्न पदों का अर्थ समझाइए : अनावृत, आवेश, अवक्षय परत , विभव प्राचारी |

लिखित उत्तर

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P-N सन्धि-जब एक शुद्ध अर्द्धचालक क्रिस्टल के ग्राही भाग को अशुद्धि (जैसे AI, B, In आदि) मिलाकर P-टाइप अर्द्धचालक तथा आधे भाग को दाता अशुद्धि (जैसे As, Sb, P आदि) मिलाकर N-टाइप अर्द्धचालक बनाया जाता है, तो जिस स्थान पर ये अर्द्धचालक जुड़ते हैं, उसे P-N सन्धि कहते हैं। .
अनावृत आवेश-सन्धि के बनते ही सान्द्रता प्रवणता के कारण P-टाइप अर्द्धचालक से होलों का N-टाइप अर्द्धचालक की ओर व इलेक्ट्रॉनों का N-टाइप अर्द्धचालक से P टाइप अर्द्धचालक की ओर विसरण होने लगता है तथा बहुसंख्यक आवेश वाहक सन्धि को पार करने दूसरी ओर (होल N टाइप अर्धचालक में तथा इलेक्ट्रान P टाइप अर्धचालक में ) अपने-अपने पूरको से मिलकर उदासीन हो जाते हैं। इस प्रकार सन्धि के समीप N-टाइप अर्द्धचालक में अनावृत धन आवेश (स्थिर दाता आयनों के रूप में) तथा P-टाइप अर्द्धचालक में अनावृत ऋण आवेश (स्थिर ग्राही आयनों के रूप में) संचित हो जाता है। जैसे-जैसे अवक्षय पर्त विसरण प्रक्रिया होती जाती है, सन्धि के दोनों ओर अनावृत आवेश क्षेत्र विस्तारित होता जाता है। इससे विद्युत् क्षेत्र (अनावृत आवेशों के कारण स्थापित विद्युत् क्षेत्र जिसकी दिशा N-टाइप अर्द्धचालक से P-टाइप अर्द्धचालक की ओर होती है) बढ़ता जाता है जिसके फलस्वरूप विसरण धारा (बहुसंख्यक आवेशों के विसरण के कारण) घटती जाती है तथा अपवाह धारा (विद्युत्. क्षेत्र के कारण P-टाइप अर्द्धचालक के इलेक्ट्रॉनों की N-टाइप अर्द्धचालक की ओर तथा N-टाइप अर्द्धचालक के होलों की P-टाइप अर्द्धचालक की ओर गति के कारण धारा) बढ़ती जाती है। यह प्रक्रम उस समय तक चलता है जब तक कि ये दोनों धाराएँ परिमाण में समान नहीं हो जाती। इस स्थिति में अनावृत आवेश क्षेत्र का विस्तारण रुक जाता है।
अवक्षय पर्त (ह्रासी क्षेत्र)-P-N सन्धि के दोनों ओर विकसित अनावृत आवेश की पर्त जिसमें अनावृत आवेश निश्चल होते हैं तथा कोई भी आवेश वाहक नहीं होता है, को अवक्षय पर्त कहते हैं।
विभव प्राचीर (रोधिका विभव)-P-N सन्धि के दोनों ओर अनावृत आवेश के संचय के कारण सन्धि के आर-पार एक विभवान्तर उत्पन्न हो जाता है जिसकी ध्रुवता इस प्रकार होती है कि यह बहुसंख्यक आवेशों की ओर प्रवाह का विरोध करता है। इस विभवान्तर को ही विभव प्राचीर कहते हैं।
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