N एवं P प्रकार के अर्धचालक-
P-N संधि डायोड की कार्यविधि-
1. अग्र बायस- जब P-N संधि डायोड के P- क्षेत्र को एक बैटरी के धन सिरे से तथा N- क्षेत्र को उसी बैटरी के ऋण सिरे से जोड़ दिया जता है तो इसे अग्र बायस तथा डायोज को अग्र बायसित कहते हैं।
जब बैटरी द्वारा आरोपित बाह्य वोल्टता रोधिका विभव से अधिक होती है तो p- क्षेत्र के होल बैटरी के धन सिरे से प्रतिकर्षित होकर संधि की ओर तथा N-क्षेत्र के इलेक्ट्रॉन बैटरी के ऋण सिरे से प्रतिर्षित होकर संधि की ओर चलने लगते हैं । संधि पर होल और इलेक्ट्रॉन संयोग करते हैं। जिससे संधि में से विद्युत का चालन होने लगता है। ज्येांहि संधि पर होल और इलैक्ट्रॉन मिलते हैं, बैटरी के धन सिरे के पास p- क्षेत्र के सहसंयोजी बुध टूटते जाते हैं और इस प्रकार मुक्त हुए इलेक्ट्रॉन बैटरी के धन सिरे में प्रवेश करते जाते है। इलेक्ट्रॉन मुक्त होने से बने होल, संधि की ओर चलने लगते हैं। इसी समय बैटरी के ऋण सिरे से निकलकर इलेक्ट्रॉन N- क्षेत्र में प्रवेश करते हैं संधि की ओर चलते हैं। संधि पर ये होल और इलेक्ट्रॉन मिलते जाते हैं जिससे संधि में धारा बहने लगती है जिसे अग्र दिशिक धारा कहते हैं। यह धारा mA की कोटि की होती है।
2. पश्च बायस- जब P-N संधि डायोड के P- क्षेत्र को बैटरी के ऋण सिरे से तथा N- क्षेत्र की उसी बैटरी के धन सिरे से जोड़ दिया जाता है तो इसे पश्च बायस तथा डायोड को पश्च बायसित कहते हैं।
पश्च बायस में P- क्षेत्र के होल बैटरी के ऋण सिरे से आकर्षित होकर संधि से दूर चलने लगते हैं। इसी प्रकार N- क्षेत्र के इलेक्ट्रॉन बैटरी के धन सिरे से आकर्षित होकर संधि से दूर चलने लगते हैं। संधि पर होल और इलैक्ट्रॉन नहीं मिल पाते । अतः संधि से विद्युत का चालन नहीं हो पाता।
ऊष्मीय उत्तेजन के कारण P- क्षेत्र में कुछ इलेक्ट्रॉन तथा N- क्षेत्र में कुछ होल विद्यमान रहते हैं जो बैटरी के सिरों से प्रतिकर्षित होकर संधि की ओर चलते हैं तथा संधि पर संयोज करते हैं। फलस्वरूप संधि में माइक्रो ऐम्पियर `(mu A)` की कोटि की अल्पधारा बहने लगती है। इसे पश्च दिशिक धारा कहते हैं। स्पष्ट है कि पश्च दिशिक धारा अल्पसंख्यक आवेश वाहकों के बहने के कारण होती है।
पश्च वोल्टता को बढ़ाने पर प्रारंभ में धारा रहती है किंतु बहुत अधिक पश्च वोल्टता लगाने पर संधि के पास सहसंयोजक बंध टूट जाते हैं जिससे होल और इलेक्ट्रॉन बहुत अधिक संख्या में उत्पन्न हो जाते हैं। अतः धारा अचानक बहुत बढ़ जाती है। इस स्थिति में संधि डायोड के सिरों पर लगाये गय उत्क्रम वोल्टता को जेनर भंजन वोल्टता कहते हैं।