प्रतिवर्ती क्रिया (ReflexAction)-"प्रतिवर्ती क्रियाएँ अनैच्छिक, अविवेचित होती हैं और अचेतन रूप से ग्राही अंगों के उद्दीपन से होती हैं।" दूसरे शब्दों में, "प्रतिवर्ती क्रियाएँ किसी बाहा उद्दीपन (Stimulus) के कारण तंत्रिका माध्यित त्वरित प्रतिक्रिया के रूप में अनैच्छिक रूप से होती हैं।" इनका संचालन व नियन्त्रण मेरुरज्जु अथवा अनुमस्तिष्क द्वारा विना विवेचन के किया जाता है। जैसे-गर्म वस्तु छू जाने पर सम्बन्धित अंगों को हटा लेना।
जन्म के समय से उपस्थित प्रतिवर्ती क्रियाएँ जन्मजात या अनकंडीशन्ड रिफ्लेक्स तथा बाद में विकसित प्रतिवर्ती क्रियाएँ कंडीशन्ड रिफ्लेक्स कहलाती हैं। प्रतिवर्ती क्रियाओं में तंत्रिका आवेग जिस मार्ग से होकर गुजरती है वह प्रतिवर्ती चाप. (Refiex arch) कहलाता है। यह चाप निम्नलिखित भागों का बना होता है-संवेदी अंग. संवेदी न्यूरॉन, मेरुरज्जु, प्रेरक तन्त्रिका तथा अपवाह अंग (Efector ongan)।
क्रियाविधि -मनुष्य में प्रतिवर्ती आवेग की गति बहुत अधिक तीव्र होती है सर्वप्रथम संवेदी अंग बाह्य संवेदना को ग्रहण कर संवेदी तन्त्रिका तन्तुओं द्वारा तन्त्रिका केन्द्र (मेरुरण्णु) को पहुँचा दी जाती है। तन्त्रिका केन्द्र इसे एक प्रेरणा के रूप में बदलकर प्रभावी अंगों को पहुँचा देती है जो प्रतिक्रिया को सम्पन्न करते हैं। उदाहरण-(I) स्वादिष्ट भोजन देखकर मुँह में लार का आ जाना लार खावण प्रतिक्रिया का उदाहरण है। (2) किसी वस्तु का नेत्रों के समीप आने पर पलकों का झपक जाना आदि।
प्रतिक्रिया से लाभ-(1) प्रतिवर्ती क्रियाओं की तीव्रता बहुत अधिक होती है जिससे जीव सन्निकट दुर्घटनाओं से अपनी रक्षा कर लेता है। (2) इसमें जन्तुओं को सोचने-समझने की जरूरत नहीं पड़ती जिससे मस्तिष्क पर भार नहीं पड़ता है।
