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BIOLOGY
बीजों के प्रकीर्णन की विभिन्न विधियों का...

बीजों के प्रकीर्णन की विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए।

लिखित उत्तर

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संवर्धन के प्रकार-प्रायोगिक उद्देश्यों के आधार पर संवर्धन निम्नलिखित प्रकार के होते है-
1. कैलस संवर्धन (Callus Culture)-जैसा कि पूर्व में बताया गया है, कैलस संवर्धन हेतु पौधे के किसी भी भाग का कत्तोंतक के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार के संवर्धन में पादप कोशिकाएँ अनियन्त्रित विभाजनों द्वारा अविभेदित कोशिकाओं के समूह अर्थात् कैलस (Callus) का निर्माण करती हैं। पादप वृद्धि नियंत्रकों की उचित मात्रा व ऑक्सिन तथा साइटोकाइनिन्स के संयोगों द्वारा कैलस से जड़, प्ररोह, भ्रूणाभ व सम्पूर्ण पादपक (Plantlet) विकसित किए जा सकते हैं। कैलस से पादपों का पुनर्जनन निम्नलिखित विधियों द्वारा सम्पन्न होता है-
(i) अंगोद्भवन (ii) कायिक भ्रूणोद्भवन
(i) अंगोद्भवन-कोशिकाओं के असंगठित समूह कैलस से विभेदन की प्रक्रिया द्वारा पादप अंग जैसे जड़, प्ररोह, कलिका आदि का विकास होना अंगजनन अथवा अंगोद्भवन कहलाता है।कैलस से जड़ो का विकास राइजोजेनेसिस का जडजनन तथा प्ररोह का विकास प्रसेहजनन (Carlogenesis) कहलाता है। जड़-4प्ररोह जनन ऑक्सीन, साइटोकानिन अनुपात, संवर्धन माध्यम की भौतिक अवस्थाओं, रासायनिक संगठन तथा कत्तोंतक की प्रकृति पर निर्भर करता है। सामान्यत: आक्सिन-साइटोकाइनिन के उच्च अनुपात पर जड़ जनन व निम्न अनुपात पर प्ररोहजनन की प्रक्रियाएँ सम्पन्न होती है।
(ii) कायिक भ्रूणोद्भवन-जब भ्रूण का निर्माण कायिक ऊतकों की कोशिकाओं से होता है तब भ्रूण जनन की प्रक्रिया कायिक भ्रूणोद्भवन कहलाती है। कायिक भ्रूण अगुणित अथवा द्विगुणित हो सकता है। भ्रूण का अगुणित अथवा द्विगुणित होना उन कोशिकाओं की प्रकृति पर निर्भर करता है जिनसे इनका विकास हुआ है। कायिक भ्रूणोद्भवन की प्रक्रिया का सर्वप्रथम प्रदर्शन रीनर्ट व स्टीवर्ड (Reinert and Steward) द्वारा सन् 1958 में किया गया, जब इन्होंने गाजर (डॉकस कैरोटा) के कैलस व निलम्बन संवर्धन द्वारा कायिक भ्रूणों का संवर्धन किया।
(2) अंग संवर्धन (Organ Culture)-किसी पादप के विभिन्न अंगों जैसे मूल, अण्डाशय आदि को संवर्धन माध्यम पर संवर्धित कर सम्पूर्ण पादप को विकसित करना अंग संवर्धन कहलाता है।
(3) भ्रूण संवर्धन (Embryo Culture)-पौधों के अपरिपक्व अथवा पूर्ण परिपक्व भ्रूण के संवर्धन को भ्रूण संवर्धन कहते हैं। भ्रूण संपर्थन का उपयोग परिणय पूण पिकास राणा परिषद पूण की दृष्टि एवं अंकुरण को प्रेरित करने हेतु किया जाता है। अपरिपक्व भ्रूण संवर्धन को भ्रूण बचाव या भ्रूण रक्षा (Embryo rescue) भी कहा जाता है। भ्रूण बचाव तकनीक का उपयोग दूरस्थ संकरण में अल्पविकसित भ्रूण को बचाने में किया जाता है, जिससे संकरण से प्राप्त होने वाले दुर्लभ जननक्षम पादप विकसित किए जा सकें।
(4) पराग कोष तथा परागकण संवर्धन-अर्धसूत्री विभाजन के अध्ययन हेतु पराग कोष का पात्रे संवर्धन सर्वप्रथम जापानी वैज्ञानिक शिमाकुरे द्वारा सन् 1943 में किया गया था। सन् 1964 में भारतीय वैज्ञानिक शिप्रा गुहा मुखर्जी तथा सतीश चन्द्र महेश्वरी ने धतूरे के पौधे के परागकोष व पराग कक्ष संवर्धन से अगुणित पादप प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की। अगुणित पादप प्राप्त करने की तकनीक का उपयोग पादप प्रजनन में शुद्धवंश क्रम प्राप्त करने में किया जाता है। सोलेनेसी कुल के पादपों में से सबसे अधिक अगुणित पादप विकसित किए गए हैं।
(5) कोशिका निलम्बन संवर्धन-तरल माध्यम में कोशिकाओं के संवर्धन को निलम्बन संवर्धन कहते हैं। निलम्बन संवर्धन का उपयोग व्यावसायिक स्तर पर जैव सक्रिय अणुओं तथा द्वितीयक उपापचयजों के संश्लेषण व उत्पादन में किया जाता है। विगलित या एकल पादप कोशिकाओं को सामान्यतः वातित (Aerated) तरल संवर्धन माध्यम पर संवर्धित किया जाता है। इन कोशिकाओं को पृथक रखने एवं संवर्धन माध्यम में ऑक्सीजन की आपूर्ति बनाए रखने हेतु संवर्धनों को घूर्णी हल्तिंत्र पर रखा जाता है।
(6) जीवद्रव्यक संवर्धन-जीवद्रव्यक संवर्धन की प्रक्रिया में सर्वप्रथम निर्जीकृत चयनित कतॊतकों को सेल्यूलेज, हेमीसेल्यूलेज व पैक्टीनेज एन्जाइमों से उपचारित कर इन्हें भित्ति रहित किया जाता है। इन भित्तिरहित पादप कोशिकाओं जिनको जीवद्रव्यक (Protoplast) कहते हैं, को पहले तत्त्व संवर्धन माध्यम पर, तत्पश्चात अर्धठोस माध्यम पर संवर्धित कर पादपों का निर्माण, अंगजनन, कायिक भ्रूण, जनन की विधियों द्वारा किया जाता है। जीवद्रव्यक संवर्धन की प्रक्रिया का उपयोग साइब्रिड निर्माण में किया जाता है।
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