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BIOLOGY
उपयोगिता के आधार पर पादप रेशों का वर्गीक...

उपयोगिता के आधार पर पादप रेशों का वर्गीकरण देते हुए, वस्त्र रेशों का विस्तार से वर्णन कीजिए।

लिखित उत्तर

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उपयोगिता के आधार पर पादप रेशों को छ: वग्गों में बाँटा गया है-
1. बस्त्र रेशे (Textile Fiberes)- इन रेशों का प्रयोग कपड़े, रस्सियाँ, बोरे, सुतली आदि बनाने में किया जाता है, जैसे-कपास जूट, सन आदि।
2. कुर्च या बुश रेशे (Brush Fibres)-ये रेशे झाडू, ब्रुश बनाने के लिये प्रयुक्त किये जाते हैं। जैसे-खजूर की पत्तियाँ।
3. गूँथने तथा खुरदरे बुनने वाले रेशे (Plaiting and rough weaving fibres)-इन रेशों का प्रयोग टोकरियाँ, चटाइयाँ, कुर्सियों की सीट आदि बनाने में किया जाता है। जैसे- बाँस।
4. भराव रेशे (Filling Fibers)-उदाहरण-कपास, मदार, सेमल, कोयर (नारियल) आदि के रेशे भराव रेशों के नाम से जाने जाते हैं जो कि रजाइयाँ, गद्दे तथा तकिये आदि के भरने में प्रयुक्त किये जाते हैं।
5. प्राकृतिक रेशे (Natural Fibres) शहतूत (Broussonetia papyrifera) की छाल से टापा वस्त्र (Tapa cloth) बनाया जाता है।
6. कागज बनाने वाले रेशे (Paper making fibres) बॉस, नीलगिरि (Eucalyptus) कई प्रकार की घासें, सफेदा (Populusalba) आदि सभी कागज बनाने वाले रेशे हैं। इनसे कागज, बोर्ड आदि बनाये जाते हैं।
वस्त्र रेशे (Textile Fibers)
कपास (Cotton)
वानस्पतिक नाम - गॉसीपियम जातियाँ (Gossypium spp.)
कुल - मालवेसी (Malvaceae)
आर्थिक दृष्टि से उपयोगी पादप भाग-रेशों के लिये बाह्यबीजचोल (Testa) पर स्थित सतह रेशे, वसीय तेलों के लिये बीज। कपास की कई जातियाँ हैं जैसे-गा.हिर्सुटम (G.hirsutum), गाँ. हर्बेसियम (G.herbaceum), गाँ. आबोरियम (G. arboreum) तथा गाँ. बार्बंडेन्स (G. barbadense) आदि प्रमुख हैं।
भारत प्राचीन काल से कपास तथा इससे सम्बन्धित उत्पादों के निर्माण का प्रमुख केन्द्र था। भारत में उत्पादित ढाका की मलमल (Dacca Muslin) विश्व प्रसिद्ध थी।
पादप- यह एकवर्षीय, 2-6 फीट ऊँचा पादप है। इसका तना उध्ध्व, अशाखित, काष्ठीय, भूरे रंग का होता है। पत्तियाँ हस्ताकार, पालिवत, पुष्प बड़े, सवृन्त, सहपत्र तीन, बड़े, दलपुंज बड़े प्राय: पीले, व्यावर्तित पुंकेसर असंख्य, एकसंघी, फल विदारक सम्पुटिका (Loculicidal capsules) होते हैं। तरुण फल को डोडी (BolI) कहते हैं। कपास का बीज अण्डाकार, भूरा तथा बाह्यबीजचोल पर लम्बे, सफेद रेशेमय अतिवृद्धियाँ उत्पन्न होती हैं। लिन्ट या स्टेपल (Lint or staple) व्यापारिक रेशा होता है तथा इस ी के साथ छोटे रेशे फज (Fuzz) भी होते हैं।
MCu-2, 8, Ak-277, सुजाता, महालक्ष्मी वराहलक्ष्मी आदि सभी कपास की उन्नत किस्में हैं।
कपास के उपयोग- 1. कपास के रेशे (रूई से) सूती वस्त्र, समिश्र वस्त्र (Blended clothes), होजरी पदार्थ उत्पादित किये जाते हैं ।
2. रेशे शुद्ध सेल्युलोज होने के कारण उद्योग में कच्ची सामग्री के रूप में प्रयुक्त होते है।
3. इनका प्रयोग कम्बल, रस्से, दरियाँ, फर्श व टायरो को बनाने में किया जाता। है।
4. गद्दे, तकिये, रजाई भरने में।
5. इस रेशे से अवशोषक रूई, पट्टियाँ आदि बनायी जाती हैं।
6. कपास के बीज का प्रयोग अर्धशुष्कनं खाद्य तेल को प्राप्त करने में भी किया जाता है।
सन, सनई (San, Sunhemp)
वानस्पतिक नाम - क्रोटेलेरिया जन्सिया (Crotalaria juncea)
कुल - लेग्युमिनोसी (Leguminosae) अथवा फेबेसी (Fabaceae)
उपकुल - पेपिलियोनेटी (Papilionatae)
उपयोगी पादप भाग - स्तम्भ फ्लोएम रेशे तथा परिरम्भ रेशे। सन की उत्पत्ति भारतीय उपमहाद्वीप से मानी जाती है। भारत में इसकी खेती आन्ध्र प्रदेशं, तमिलनाडु व मध्यप्रदेश तथा कुछ अन्य राज्यों में की जाती है। सन की खेती रेशे व हरी खाद के लिये की जाती है।
पादप-सन हेम्प का पादप काफी लम्बा (1.5 मीटर), एकवर्षी, शाकीय क्षुप है। इसकी खेती वर्षा ऋतु में की जाती है। इसके रेशे को स्तम्भ से बास्ट रेशे के रूप में प्राप्त किया जाता है। इस रेशे का स्तम्भ से पृथक्करण पूर्यीविरेशन या अपगलन (Retting) विधि द्वारा किया जाता है। इस प्रक्रिया में पके हुए पौधों के समूह (Bundle) को जल में डुबोकर 5 -7 दिन तक सदया जाता है। सडाने का कार्य कलोगिियम ्येस्क- जीवाणु करते हैं। इसके पश्चात रेशों को स्तम्भ से छीलकर, धोकर व सुखाकर गोंठों में बाँध लिया जाता है।
रेशों का उपयोग- 1. सन के रेशों को बटकर (Twist) मुख्यत: रस्से बनाये जाते हैं।
2. इन रेशों से किरमिच (Canvas), बोरियाँ, मछली पकड़ने के जाल व पतली डोरियाँ बनायी जाती हैं।
3. अपरिपक्व रेशों से सिगरेट का कागज, टिशु पेपर बनाये जाते हैं।
4. पूरा पादप हरी खाद के रूप में उपयोगी होता है।
5. बीजों से प्राप्त गोंद छपाई उद्योग में उपयोगी होता है।
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