महिलाओं में माहवारी चक्र पाया जाता है। जिसमें जनन काल में एस्ट्रोजन नियमित रूप से स्रावित होता रहता है। यही कारण है कि मादा जनन तन्त्र में नियमित चक्रीय परिवर्तन होते हैं, जिन्हें आर्तव चक्र (Menstrual cycle) कहा जाता है। मैन्सस् का अर्थ माह होता है। 2-14 वर्ष की उम्र में प्रथम बार माहवारी (Puberty) शुरू होती है, जिसे रजोदर्शन (Menarehe) कहा जाता है। इस चक्र का अन्त लगभग 50 वर्ष की आयु तक होता है। इस अवस्था को रजोनिवृत्ति (Menopause ) कहा जाता है महिलाओं में आर्तव चक्र औसतन 28 दिन का होता है आर्तव चक्र का निम्ननिखित बिन्दुओं के आधार पर समझा जा सकता है-
(1) आर्तव चक्र (Menstrual cycle) - प्राइमेट स्तनियों में होने वाले जनन चक्र को आर्तव चक्र कहा जाता है। रजस्राव प्रारम्भ के प्रथम दिन से यह चक्र प्रारम्भ होता है जो तीन से पाँच दिन तक रहता है इसे रजोधर्म या ऋतुसराव (Menstruation or menses) भी कहा जाता है। इस प्रावस्था में रबत, ऊतक द्रव (Tissue fluid) श्लेष्मा (Mucous) व उपकला कोशिकाओं का आवर्ती स्प्रव (Periodic diseharge) होता है । इस प्रावस्था में गर्भाशय के अन्त:स्तर (Endometrium) का अस्थाई स्तर स्ट्रेटम फंक्शनेलिस (Stratum functionalis) जुड़ जाती है। गर्भाशय अंत: स्तर बहुत पतली हो जाती है क्योंकि अब स्ट्रैटम-बैसैलिस (Stratum basalis) ही शेष बचती है। यह स्राव गर्भाशयी गुहा से गर्भाशय-ग्रीवा में होता हुआ योनि (Vagina) से बाहर चला जाता पाँचवें दिन तक रुक जाता है। जब रजस्राव नहीं होता है, तो यह गर्भधारण का संकेत होता है।
(2) पुट्टकीय प्रावस्था (Follicular phase) - पुट्टकीय प्रावस्था महावारी के 6 वें दिन से 13वें दिन तक होती है जिससे हाइपोथैलेमस के FSH-RF के उद्दीपन द्वारा पीयूष ग्रन्थि द्वारा FSH का सावण बढ़ जाता है जिसके द्वारा प्राइमरी फॉलिकल को ग्राफियन फॉलिकल में परिवर्तित होने के लिए उदीपण करता है। कालियला फोतिकाओों से एल्ट्रोजन हार्मोन स्रावित होता है। एस्ट्रोजन का बढ़ता हुआ स्तर एण्डोमैट्रियम को मोटा करता है व इसे पुनर्निर्मित करता है। टूटी रुधिर वाहिनियों द्वारा ऊतकों व श्लेष्म झिल्ली की मरम्मत की जती है। इस प्रावस्था में सबसे अधिक ऐस्ट्रोजन हार्मोन का स्राव होता है। 13वें दिन कदम से LH हाम्मोन बढ़ जाता है।
3. अण्डोत्सर्ग प्रावस्था (0vulatory phase) आर्तव चक्र के 14वें दिन LH व FSH दोनों ही हार्मोन अपने उच्चतम स्तर को प्राप्त करते हैं। मध्य चक्र के दौरान LH का स्तर अधिकतम स्तर पर पहुँच जाता है। इसे LH सर्ज कहते हैं। यह सर्ज अण्डोत्सर्गं के लिए आवश्यक होता है। आर्तव चक्र के 14वें दिन ग्राफीयन पुटक फट जाता है एवं इसमें स्थित परिपक्व अण्डाणु स्वतन्त्र हो जाते हैं। इस क्रिया को अण्डोत्सर्ग (Ovulation) कहा जाता है। यह क्रिया LH (Luteinizing hormone) द्वारा नियन्त्रित की जाती है।
(4) पश्च अण्डोत्सर्ग प्रावस्था (Post-ovulatory phase) पश्च अण्डोत्सर्ग प्रावस्था 15वें दिन से 28 दिन तक की होती हैं। अण्डोत्सर्ग के बाद LH का स्रावण कार्पस ल्यूटियम (Corpus lhuteum) के परिवर्द्धन को प्रेरित करता है। अब कॉर्पस ल्यूटियम से एस्ट्रोजन व प्रोजेस्टेरॉन का अधिक स्रावण होता है। यह प्रौजेस्टेरॉन गर्भाशय की अंत: स्तर को निषेचित अण्डाणु के आरोपण रोपण के लिए तैयार करता है। प्रोजेस्टोरान गर्भाशयी अन्त:स्तर को बनाए रखता है। जिसमें गर्भाशय अंत:स्तर का मोटा होना, ग्लाइकोजन संग्रह-करना तथा ऊतक द्रव की मात्रा में वृद्धि होती है।
