मेण्डल ने अपने प्रयोगों तथा उनके द्वारा प्राप्त परिणामों से वंशागति के महत्त्वपूर्ण विभिन्न नियमों का प्रतिपादन किया है जो कि भण्डल क वशागात का नियम या विभिन्न नियमा का नाम सजान जात हा
(i) प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)-मेण्डल द्वारा किये गये मटर के एक संकरण प्रयोगों से प्राप्त `F_(1)` पौड़ी में केवल एक प्रकार के एक लक्षण पौधे ही प्राप्त हुये। यदि लम्बे पौधे का बौने पौधे से संकरण करवाया जाये तो केवल लंबे पौधे प्राप्त होते हैं अर्थात् लम्बाईवाले लक्षण ने बौने वाले लक्षण को मटर के पौधे में प्रकट नहीं होने दिया। अत: लम्बाई वाले लक्षण को प्रभावी (Dominant Character) कहा गया। इसी प्रयोग के परिमाण को मेण्डल ने "प्रभाविता का नियम" कहा|
(ii) युग्मकों की शुद्धता का नियम अथवा विसंयोजन का नियम (Law of Purity of gametes or law of Segregation) मेण्डल ने अपने एक संकर संकरण के प्रयोगों के परिणाम के आधार पर युग्मकों की शुद्धता का नियम अथवा विसंयोजन का नियम प्रतिपादित किया। एक संकर संकरण के प्रयोगों में `F_(2)` पीढ़ी में एक समान संकर लम्बे पौधे प्राप्त होते हैं जबकि `F_(2)` पीढ़ी में स्वनिषेचन के पश्चात् जनक पौधों के समान लम्बे व बौने पौधे प्राप्त होते हैं। `F_(1)` पीढ़ी में लम्बे व बौनेपन के कारक एक साथ रहते हुए भी एक-दूसरे के साथ सम्मिश्रित नहीं होते हैं अर्थात् एक पर दूसरे का प्रभाव नहीं पड़ता है। ये कारक `F_(2)` पीढ़ी में एक दूसरे से प्रथक् होते हुए 75% लम्बे तथा 25% बौने पौधे बनते हैं। इस प्रकार युग्मक अपनी शुद्धता बनाये रखते हैं। इसे युग्मको की शुद्धता का नियम कहते हैं व युग्मक निर्माण के समय दोनों युग्मविकल्पी (Tt) एक दूसरे से विसंयोजित (Segregate) होकर अलग-अलग युग्मकों में पहुँच जाते हैं। `F_(2)` पीढ़ी में अप्रभावी लक्षण बौनापन भी प्रकट हो जाता है। अतः इस प्रकार युग्मकों में प्रभावी तथा अप्रभावी कारकों का विसंयोजन या पृथक होना मेण्डल का विसंयोजन का नियम कहलाता है।
(iii) स्वतन्त्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment) : यह नियम द्विसंकर तथा उच्च स्तर के संकरणों पर लागू होता है। एक संकर संकरण पर लागू नहीं होता है। मेण्डल द्वारा किये गये द्विसकर तथा उच्च संकरण के प्रयोगों में जब दो या दो से अधिक विपर्यासी लक्षणों के मध्य संकरण करवाया जाता है तो प्रथम F1 पीड़ी में प्रभावी लक्षण वाले संयोग प्राप्त होते हैं परन्तु जब इनमें प्राप्त बीजों को उगाया जाता है एवं उनमें स्वनिषेचन करवाया जाता है तो वे एक-दूसरे से प्रभावित हुए बिना, स्वतन्त्र रूप से संतति में प्रकट होते हैं। अर्थात् एक लक्षण की वंशागति का दूसरे लक्षण की उपस्थिति से किसी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ता है इसी को स्वतन्त्र अपव्यूहन का नियम कहते हैं।
