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PHYSICS
नेत्र दृष्टि दोषों के बारे में विस्ता...

नेत्र दृष्टि दोषों के बारे में विस्तार से समझाते हुए उन्हें दूर करने के उपाय बताइए।

लिखित उत्तर

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नेत्र दृष्टि दोष एवं उनका निराकार - उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियों में समंजन क्षमता कम होने से , चोट लगने से , नेत्रों पर अत्यधिक तनाव आदि अनेक कारणों से नेत्रों की समंजन क्षमता में कमी आ जाती है या उनकी ये क्षमता खत्म हो जाती है अर्थात नेत्र की दृष्टि परास अर्थात समंजन सीमायें 0.25 मीटर से अनंत तक नहीं होती हैं , तो उस नेत्र को दोषयुक्त नेत्र कहते हैं। नेत्र में दृष्टि सम्बन्धी निम्न प्रकार के दोष होते हैं -
(1) निकट दृष्टि दोष - इस रोग से पीङित व्यक्ति की आँख निकट की वस्तु को साफ देख सकती है, लेकिन दूर की वस्तु को स्पष्ट नहीं देख सकती हैं। इस दोष से पीङित आँख में बिम्ब दृष्टपटल के पूर्व ही बन जाता हैं।
इस दोष के उत्पन्न होने के कारण हैं - (i) अभिनेत्र लेंस की वक्रता का अत्यधिक होना अथवा
(ii) नेत्र गोलक का लम्बा होना।
इस दोष के निवारण के लिए उचित क्षमता का अवतल लेंस नेत्र के आगे लगाया जाता है। अवतल लेंस अनंत पर स्थित वस्तु से आने वाली समांतर किरणों को इतना अपसारित करता है जिससे वे किरणे उस बिंदु से आती हुई प्रतीत हो जो दोषयुक्त नेत्रों के स्पष्ट देखने का दूर बिंदु है। आजकल लेजर तकनीक का उपयोग करके भी इस दोष का निवारण किया जाता है।

(a) निकट - दृष्टि दोषयुक्त नेत्र , (b) निकट - दृष्टि दोषयुक्त नेत्र का दूर - बिंदु (c ) अवतल लेंस के उपयोग द्वारा निकट - दृष्टि दोष का संशोधन दूर दृष्टि दोष - इस रोग से पीङित व्यक्ति की आँख दूर की वस्तु को स्पष्ट देख सकती हैं लेकिन निकट की वस्तु को साफ नहीं देख सकती है। इस दोष में व्यक्ति को समान्य निकट बिंदु (25 cm ) से वस्तुयें धुधंली दिखती हैं , लेकिन जैसे - जैसे वस्तु को 25 cm से दूर ले जाते हैं , वस्तु स्पष्ट हो जाती है। एक प्रकार से दीर्घ दृष्टि दोष के निवारण के लिए उचित क्षमता का उत्तल लेंस नेत्र के आगे लगाया जाता है। यह लेंस पारा की वस्तु का आभासी प्रतिक्रिया उतना दूर बनाता है , जितना की दृष्टि दोषयुक्त नेत्र का निकट बिंदु है। इससे पुनः नेत्र की निकट की वस्तुयें स्पष्ट दिखाई देने लगती हैं।

चित्र -(a) , दीर्घ दृष्टि दोषयुक्त नेत्र तथा (c ) दीर्घ - दृष्टि का संशोधन
(3) जरा दृष्टि दोष - आयु में वृद्धि के साथ नेत्र के लेंस का लाचिनापन कम हो जाता हैं तथा नेत्र की समंजन क्षमता भी घटती जाती है। इस कारण से दूर एवं पास दोनों ही वस्तुएँ स्पष्ट नहीं दिखाई देती हैं। इस दोष को जरा दृष्टि दोष कहते हैं। नेत्र के इस दोष को दूर करने के लिए द्विफोकस लेंस प्रयुक्त किए जाते हैं। सामान्य प्रकार के द्विफोकस लेंसों में नीचे का भाग उत्तल लेंस (पास की वस्तुओं को देखने के लिए ) एवं ऊपरी भाग अवतल लेंस (दूर वस्तुओं को देखने के लिए ) होता है।
(4) दृष्टि वैषम्य दोष - दृष्टि - वैषम्य दोष या अबिंदुकता दोष कॉर्निया की गोलाई में अनियमितता के कारण होता हैं। इसमें व्यक्ति को समान दुरी पर रखी ऊर्ध्वाधर व क्षैतिज रेखाएं एक साथ स्पष्ट दिखाई नहीं देती हैं बेलनाकार लेंस का उपयोग करके इस दोष का निवारण किया जाता है।
(5) मोतियाबिंद -व्यक्ति की आयु बढ़ने के साथ नेत्र लेंस की पारदर्शिता खत्म होने लगती है एवं उसका लचीलापन कम होने लगता है। इस कारण यह प्रकाश का परावर्तन करने लगता है इससे प्रभावित व्यक्ति को वस्तु स्पष्ट दिखाई नहीं देती है। इस दोष को मोतियाबिंद कहते हैं। इस दोष को दूर करने के लिए नेत्र लेंस को हटाना पड़ता है। पहले शल्य चिकित्सा द्वारा मोतियाबिंद को निकाल दिया जाता था। नेत्र लेंस को निकाल देने से व्यक्ति को मोटा व गहरे रंग का चश्मा लगाना पड़ता था । आधुनिक विधि में मोतियाबिंद युक्त नेत्र लेंस को हटाकर एक कृत्रिम लेंस लगा दिया जाता है जिसे इंट्रा आक्युलर लेंस कहते हैं। इससे व्यक्ति को सही दिखाई देने लगता है।
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