आन्तरिक विवर्तनिक शक्तियाँ-पृथ्वी की आन्तरिक विवर्तनिक शक्तियाँ पृथ्वी के अन्दर रहकर कार्य करती हैं व बाहर से दिखाई नहीं देतीं। इन शक्तियों की उत्पत्ति पृथ्वी के नीचे गहराई में उपस्थित ताप से चट्टानों के फैलने व सिकुड़ने तथा पृथ्वी के अन्दर गर्म तरल पदार्थ मैग्मा के स्थानान्तरण के कारण होती है। इस प्रकार की शक्तियों के निम्न उदाहरण दिये जा रहे हैं-
(i) ज्वालामुखी (Volcano)- इसमें पृथ्वी के अन्दर होने वाली हलचल के कारण धरती हिलने लगती है तथा भूपटल को फोड़कर धुआं, राख, वाष्प व गैसें बाहर निकलने लगती हैं। अनेक बार अधिक गर्म चट्टानें पिघलकर लावा के रूप में बाहर बहने लगती हैं। पृथ्वी की सतह पर बने मुख से ज्वालाएँ निकलने के कारण इनका हिन्दी नाम ज्वालामुखी पड़ा। अंग्रेजी में वोल्केनो नाम वेल्केनो द्वीप के नाम "पर पड़ा है। इस द्वीप पर उपस्थित पुराने ज्वालामुखी को सेमवासी पातालपुरी का मार्ग मानते थे। ज्वालामुखी का सम्बन्ध भूगर्भ से होता है । दाब के कारण लावा एक नली के रूप में सतह की ओर ऊपर उठता जाता है और फिर बाहर निकलकर फैलने लगता हैं।
कुछ ज्वालामुखी निरन्तर सक्रिय रहते हैं तो कुछ रुक-रुककर सक्रिय होते रहते हैं। कई बार सक्रिय रहकर सदा के लिए बंद हो जाते हैं। वैसे तो ज्वालामुखी संसार के हर भाग में पाए जाते हैं किन्तु प्रायः ये नियमबद्ध मेखलाओं पर उपस्थित रहते हैं। उदाहरण के तौर पर प्रशान्त महासागर के द्वीपों और उनके चारों ओर तटीय भागों में ज्वालामुखी अधिक पाये जाते हैं। ज्वालामुखी से भयावह दृश्य उपस्थित हो जाता है व जानमाल की भारी हानि होती है परन्तु इसके द्वारा बनी मिट्टी उपजाऊ होती है। अनेक उपयोगी पदार्थ जैसे-गंधक, बोरिक अम्ल इत्यादि कीमती धातुएँ लावा के साथ बाहर आ जाती हैं। गर्म पानी के झरने भी इनके कारण बनते हैं।
(ii) भूकम्प (Earthquake)-आन्तरिक विवर्तनिक शक्तियों का एक प्रभाव भूकम्प है। भूकम्प शब्द का अर्थ भू-सतह के कम्पन से है। भूगर्भ में होने वाली हलचल से कम्पन होता है। जहाँ की हलचल से कंपन प्रारम्भ होते हैं उसे कम्प-केन्द्र (एपीसेन्टर) कहते हैं। कम्प-केन्द्र से प्रारम्भ होकर तरंगें चारों ओर फैलती जाती हैं। ये तरंगें जब गहराई से भूमि की सतह पर पहुँचती हैं तो सतह कभी आगे-पीछे तो. कभी ऊपर-नीचे होती है। भूकम्प का महत्त्व उसकी तीव्रता पर निर्भर करता है। कभी-कभी भूकम्प की तीव्रता इतनी कम होती है कि भूकम्प आने का पता ही नहीं चलता। किसी स्थान की भूकम्प की तीव्रता, भूगर्भ हलचल की तीव्रता तथा कम्प-केन्द्र से दूरी पर निर्भर करती है। समुद्र के पानी के नीचे होने वाले भूकम्प को सागरीय कम्प कहते हैं।
भूकम्प की तीव्रता को रिक्टर पैमाने पर व्यक्त करते हैं। 4 इकाई तक भूकम्प हल्के, 5.5 तक प्रबल, 6 इकाई से ऊपर के भूकम्प विनाशकारी तथा 7 के ऊपर वाले सर्वनाशी होते हैं। इससे सम्पूर्ण क्षेत्र पूर्ण रूप से तबाह हो जाता है।
भूकम्पों की उत्पत्ति का कारण पृथ्वी के अन्दर की बनावट में उत्पन्न असंतुलन होता है। वर्तमान में भूकम्प को प्लेट विवर्तन सिद्धान्त के आधार पर समझा जा सकता है। पृथ्वी की सतह 29 प्लेटों में बंटी है, जिनमें 6 मुख्य हैं । प्लेटें धीरे-धीरे गति करती हैं तथा समस्त घटनाएँ प्लेटों के किनारे पर होती हैं। प्लेटों के किनारे रचनात्मक, विनाशी व संरक्षी तीन प्रकार के होते हैं। विनाशी किनारों पर ही अधिक परिमाण के विनाशक भूकम्प आते हैं। उत्तरी भारत, तिब्बत तथा नेपाल में भूकम्प का कारण प्लेटों के टकराव को माना जाता है। भारत को 5 भागों में बाँटा है जो भूकम्प जोखिम में होते हैं-जम्मू-कश्मीर, हिमालय, उत्तराखण्ड के कुछ-भाग अधिक जोखिम के हैं। पंजाब, हरियाणा व उत्तर प्रदेश के कुछ भाग कम जोखिम वाले हैं। इस विभाजन की अवहेलना भी होती देखी गई है। कोलकाता न्यूनतम जोखिम का क्षेत्र होने पर भी वहाँ 1737 में भयानक भूकम्प आया था, जिसमें 3 लाख के लगभग लोग मारे गये थे।