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PHYSICS
सृष्टि की उतपत्ति के विषय में भारतीय सोच...

सृष्टि की उतपत्ति के विषय में भारतीय सोच को समझाइये उत्तेर -सृष्टि की उतपत्ति के विषय में भारतीय सोच

लिखित उत्तर

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सृष्टि की उत्पत्ति पर भारतीय संस्कृति के अनुसार वैदिक कल से ही ऋषियों द्वारा मत व्यक्त किये जाते रहे थे ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है | ब्रह्माण्ड की पहले की स्थिति के बारे में निम्न प्रकार वर्णन मिलता है |
नासदासिन्नो सदासीत्तदानी नासीद्र्जो ना व्योमो परो यत |
किमावरीव: कुह कस्य शर्मन्नम्भ: किमासिद गहन गभीरम
अपनी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ़ इण्डिया में पं. जवाहरलाल नेहरू के द्वारा भी ऋग्वेद के इन्ही सूक्तो का उल्लेख किया गया है । उपरोक्त सूत्र को जुर्मन विध्दान मैक्स मुलर ने उत्पत्ति की गीत कहा है जबकि धारावाहिक भारत एक खोज में इसका हिन्दी अनुवाद शीर्षक गीत के रूप में निम्न प्रकार प्रस्तुत किया गया है ।
सृष्टि से पहले सत नहीं था/ असत भी नहीं/अन्तरिक्ष भी नहीं / आकाश भी नहीं था / छिपा था क्या ? कहाँ /किसने ढका था? / उस पल तो/ अगम अतल जल भी कहाँ था?
(i) चेतना ने एक से अनेक होते हुए ब्रह्माण्ड की रचना की । संसार में भिन्न-भिन्न प्रकार के जीव जन्तु व वस्तु चारो ओर दिखाई देते है किन्तु वे सभी मूलतः चेतना के ही रूप है । यही विस्वास अव्दैत कहलाता है ।
(ii) सृष्टि की उत्पत्ति और विकास कैसे हुआ ? इस प्रकार जवाब देने के हर प्रयास के साथ अव्दैतवाद पृष्ठ होता जायेगा ।
यदि हम सृष्टि में चारो ओर अपनी दृष्टि डाले तो हम पाते है कि हर वस्तु एक बीज से शुरू होती है । धीरे-धीरे उसका विकास होता है। विकसित होकर अपने चरम पर पहुँचती है तथा अन्त में अगले चक्र के लिये बीज बनाकर नष्ट हो जाती है। यही सम्पूर्ण सृष्टि का नियम है।
यह माना जाता है कि परमाणु की भाँति ही ब्रह्माण्ड का निर्मण होता रहता है तथा प्रत्येक कार्य के पीछे कोई न कोई कारण छिपा रहता है। यदि कारण सूक्ष्म होता है तो दिखाई नहीं दे पाता है। महर्षि कपिल के अनुसार नाश: कारणालयः अर्थात किसी का नाश होने का अर्थ उसका अपने कारण में मिल जाना है। मनुष्य का मरना उसका पंचतत्व में मिलना है जो जीवन में उसके जीने के कारण बन रहे होते है । इस तथ्य की पृष्टि रसायन शास्त्र एवं भौतिक शास्त्र भी करते है ।
जिस प्रकार बीज को वृक्ष बनने में भूमि के अन्दर कुछ इन्तजार करना पड़ता है है ठीक उसी प्रकार ब्रह्माण्ड भी कुछ समय के लिए बिना अभिव्यक्ति के विकास में मार्ग पर सूक्ष्म रूप में रहकर कार्य करता है। यह प्रलय या सृष्टि से पूर्व की अवस्था कहलाती है। जगत के कुछ समय तक सूक्ष्म रूप में रहकर प्रकट होने का समय एक कल्प कहलाता है। ब्रह्माण्ड इस प्रकार के कई कल्पो से चला आ रहा है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से लेकर उसकी परिसीमा में आने वाले परमाणु तक सभी वस्तुएँ इसी तरह तरंगीय स्वरूप में सभी दिशाओं में चलती रहती है ।
सृष्टि रचनावाद उपरोक्त भारतीय विचार के अनुरूप है। भौतिकवादियों की इसी विचारधारा कि बुद्धि ही सृष्टिक्रम का चरम विकास है। के प्रति स्वामी विवेकानन्द ने भी अपनी सहमति दर्शाई थी।
सृष्टि रचनावाद के अनुसार वर्तमान में हम मनुष्य के रूप में प्रकट बुद्धि देखते है जिसका अर्थ बृद्धि की आज से ही उत्पत्ति माना जाता है किन्तु अप्रकट रूप से बृद्धि सदैव उपस्थित रही है। पूर्णरूप से विकसित मानव के साथ ही सृष्टि का अंत है। यही सर्वव्यापक बुद्धि का नाम इश्वेर है जो जगत में आज प्रकट हो रही है ।
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