सृष्टि के विविध प्रकार के जीवधारी जैव विकास के कारण अस्तित्व में है। इसकी पृष्ठि हेतु जैव विकास के पक्ष में अनेक प्रमाण प्रस्तुत किए गए। किन्तु अब प्रश्न उठाया की जैव -विकास किस प्रकार हुआ होगा? अर्थात जैव विकास की क्रिया विधि क्या है? नई -नई जातियों के बनने की क्या प्रक्रियाएँ है? इन प्रश्नो के उत्तर खोजने में अनेक विचारको एवं जीव वैज्ञानिको ने यह मत प्रस्तुत किए किन्तु उनमे से लोमार्कवाद डार्विन का प्राकृतिक वरणवाद एवं डीव्रिज का उत्परिवर्तनवाद प्रमुख है।
जैव -विकास के सिद्धान्त की ओर सरे संसार का ध्यान तब गया जब अंग्रेज वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने जातियों की उत्पत्ति नामक पुस्तक प्रकाशित डार्विन ने अपने सिद्धान्त में दो बातो को प्रमुखता दी-
(i) वंशागत हो सकने वाली विविधताओं का अस्तित्व एवं (ii ) प्रकृति द्वारा कुछ ऐसी विविधताओं का चयन।
कुछ अवधि के लिए डार्विन के उत्क सिद्धान्त को जैव विकास की प्रमुख क्रियाविधि नहीं माना गया क्योकि उसी काल में आनुवंशिकी सम्बन्धी अनेक कई खोजे प्रकाश में आई। अनुवांशिकी विज्ञान द्वारा इस बात को समझा जा सका कि किस प्रकार से वंशागत होने वाली विविधताएँ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तान्तरित होती है। अनुवांशिकी की उत्क जानकारी जैव विकास की प्रक्रिया को समझने में अत्यन्त सहायक हुई।
चित्र में दिखाया गया है की मनुष्य चीता मछली तथा चमगादड़ किनते भिन्न जीव दिखाई देते है फिर भी मनुष्य के हाथ चीते की अगली टांग मछली me फिन्स तथा चमगादड़ के पंख के कंकाल की मुलभुत रचना एक समान होती है। यह बात का प्रमाण है कि इन सभी जीवो का उदगम एक ही पूर्वज से हुआ होगा।
चित्र मनुष्य के हाथ चीते की अलगी टांग मछली की फिन्स तथा चमगादड़ के पंख के कंकाल की मुलभुत रचना एक समान होती है। <> जैव विकास की क्रियाविधि
लैमार्क के अनुसार शरीर के जिन अंगो का निरन्तर उपयोग होता रहता है वे अत्यधिक विकसित हो जाते है जिन अंगो का बहुत कम उपयोग या बिल्कुल उपयोग नहीं हो पाता वे धीरे-धीरे ह्रासित हो जाते है। अर्थात उपयोगी अंगो का विकास एवं अनुपयोगी अंगो का ह्रास हो जाता है। उन्होंने बताया की जल में रहने वाले पक्षियों की टाँगो की उंगलियों के बीच पदजाल का विकास उंगलियों को निरन्तर चौड़ा करते रहने से हुआ है। उपार्जित लक्षणों की वंशागति के नियम की तीव्र आलोचना हुई। उदाहरणार्थ -माता -पिता के गूंगे लंगड़े बहरे या अंधे होने से उनकी संतान समान्य ही पैदा होती है किसी व्यक्ति के जीवनकालल में यदि दुर्घटनावश कुछ होता है तब उसका प्रभाव उसकी संतान में नहीं आता।
विजमान वैज्ञानिक ने चूहे की 22 पीढ़ियों की पूँछ काटी किन्तु 10वीं पीढ़ी में भी उन बिना पूँछ वाले चूहों के बच्चो पूँछ वाले ही पैदा हुए। डार्विन ने जिन छोटी-छोटी विभिन्ताओं को जैव विकास का मुख्य आधार वतलाया था वे दूसरी पीढ़ी से हस्तांतरित ही नहीं हो सकती। डार्विन ने जिन विभिन्नताओं को देखा था उनसे केवल किसी जाति विशेष में थोड़ी बहुत रचनात्मक अंतर ही हो पाते है। उनसे नयी जातियाँ विकसित न ही हो सकती। इसके विपरीत डी -ब्रिज ने बतलाया की बड़ी विभिन्नतायें जब किसी जीव में अचानक प्रकट होती है तब वे दूसरी पीढ़ी में वंशागत भी होती है। एवं इसी कारण वे नयी -नयी जातियों की उत्पत्ति होती है। इन आकस्मिक प्रकट होने वाली विभिन्नताओं को उन्होंने उत्परिवर्तन या म्यूटेशन कहा।
डी. ब्रिज के उत्परिवर्तनवाद को डार्विनवाद के साथ मिलाकर नव डार्विनवाद बनाया गया। नवडार्विनवाद के पक्षधरों ने सूक्ष्म जीवो में चरण प्रभाव को दर्शाया। इंग्लैण्ड के औधोगिक क्षेत्रों में पतंगो पर मेलेनिज्म मच्छरों में कीटनाशकों के पक्ष में प्रत्यक्ष प्रस्तुत करने के साथ ही जैव विकास की प्रक्रिया को स्पष्ट करने में सहायक हए है ।
