साइक्लोट्रोन (Cyclortron)-
साइक्लोट्रोन का निर्माण लॉरेंस व लिविंगस्टोन ने 1931 में किया था| यह एक ऐसी विघुत-चुंबकीय युक्ति है जो अपेक्षाकृत कम ऊर्जा वाले भारी धनावेशित कणों जैसे-प्रोटोन, ड्यूटोन तथा `alpha` कण के उच्च ऊर्जा में त्वरित करके इन्हे उच्च वेग प्रदान करने के लिए प्रयुक्त की जाती है|
इन त्वरित कणों का उपयोग नाभिकीय भौतिकी में बहुत अधिक महत्त्व का है|
सिद्धांत- साइक्लोट्रोन की कार्य प्रणाली इस सिद्धांत पर आधारित है जिसमे किसी स्पंदनशील (oscillating) विघुत क्षेत्र में धन आवेशित कण को त्वरित करते है| अनेक बार उसी समान विघुत क्षेत्र से धन आवेशित कण को गुजारते है तथा शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र की सहायता से कण को प्रत्येक बार वृत्ताकार पथ में विक्षेपित करके, इसकी गतिज ऊर्जा में बहुत अधिक व्रीधि प्राप्त करते है|
बनावट - इसमें दो अंग्रेजी के अक्षर D के आकार के खोखले, निर्वतित धातु के अक्ष `D_(1)` व `D_(2)` होते है| इन `D_(1)` व `D_(2)` कक्षों को एक उच्च आवृति के दोलित्र से जोड़ दिया जाता है| यह दोलित्र इन `D_(1)` व `D_(2)` कक्षों के उच्च विभान्तर `10^(4)` वोल्ट की परास व आवृति लगभग `10^(7)` हर्ट्ज़ की उत्पन्न करने में सक्षम होता है|
यह बक्स एक शक्तिशाली विघुत चुंबक NS के चुंबकीय ध्रुवों के मध्य रख दिया जाता है| जो की शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है,` (B ~~ 1.6)` वेबर/`मी^(2)` यह चुंबकीय क्षेत्र `D_(1)` व `D_(2)` के तल के लंबवत होता है| धन आवेशित कण का स्त्रोत है जो केंद्र पर स्तिथ है| आरोपित प्रत्यावर्ती विभवांतर का आवर्तकाल भी है| तब धनावेशित कण रिक्त स्थान में प्रवेश करता है तो `D_(1)` व `D_(2)` की ध्रुवता बदल जाती है अर्थात `D_(1)` धन विभव पर व `D_(1)` ऋण विभव पर हो जाता है|
अतः आवेशित कण अब `D_(2)` कक्ष में त्वरित गति से प्रवेश करता है तथा इसकी चाल बढ़ जाती है| यह चाल `D_(2)` कक्ष में गति के पथ पर नियत रहती है| अब आवेशित कण बड़ी त्रिज्या का अर्ध वृत्ताकार पथ, चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति के कारन निर्मित करता है| यह आवेशित कण पुनः अर्ध वृत्ताकार पथ पर चल कर `D_(1)` व `D_(2)` के मध्य रिक्त स्थान पर उस समय पहुँचता है, जब `D_(1)` व `D_(2)` की ध्रुवता पुनः परिवर्तित हो जाती है| यह धन आवेशित कण प्रत्येक बार त्वरित होता जायेगा र चुंबकीय क्षेत्र में कण की ऊर्जा बहुत अधिक हो जाएगी| इस त्वरित आवेशित कण को खिड़की W से E व F प्लेटों के मध्य विघुत क्षेत्र लगाकर बाहर निकल लेते है|
साइक्लोट्रोन का उपयोग हल्के कणों को त्वरित करने के लीये प्रयुक्त नहीं किया जाता क्यूंकि हलके कणों पर द्रव्यमान की सापेक्षिकता का प्रभाव अधिक होता है| इलेक्ट्रान को त्वरित करने के लिए बीटाट्रॉन का उपयोग करते है|
गति के प्राचल
(1) अर्ध-वृत्त की त्रिज्या - माना m द्रव्यमान तथा P आवेश का कोई धनावेशित कण B चुंबकीय क्षेत्र में इसके लंबवत प्रवेश करता है| यह कण वृत्ताकार पथ पर गति करेगा जिसके लिए आवश्यक अभिकेंद्र बल कण पर कार्य करने वाले चुंबकीय बल से प्राप्त होता है|
अतः `(mv^(2))/r = qvB` या `r=(mv)/(qB)`
यहाँ पर r= आयतन के वृत्ताकार पथ की त्रिज्या है तथा धनावेशित कण का वेग `v=(qBr)/m`
(2) दी की अंदर अर्धवृत्ताकार पथ में लगा समय- D के भीतर अर्ध-चालक तय करने में क्षण द्वारा लिया गया समय
`t = ("तय की गई दुरी")/("चाल") = (pir)/v`
`t=(pi xx (mv)/(qB))/v = (pim)/(qB)`
अतः स्पष्ट है की यह समय कण की चाल पर निर्भर नहीं करता अर्थात यद्यपि एक दी से दूसरे दी में जाने पर कण की चाल वृतीय पथ की त्रिज्या बढ़ने पर बढ़ती है, परन्तु प्रत्येक डी में समय समान होता है|
(3) आवर्तकाल: माना वृत्ताकार पथ का आवर्तकाल T है जो की डी के मध्य आरोपित प्रत्यावर्ती विभवांतर के आवर्तकाल के बराबर है|
`therefore` अर्धवृत में लगा समय `t=T/2`
`therefore T=2t`
`T = 2 xx (pim)/(qB) = (2pi m)/(qB) therefore tau = (pim)/(qB)` है|
(4) साइक्लोट्रोन की आवृति-
`therefore n propto 1/T, therefore n =(1/(2pim))/(qB)`
`n=(qB)/(2pim)`
(5) धनावेशी कण की अधिकतम गतिज ऊर्जा-
हम जानते है `-E("max") = 1/2mv_(m)^(2)`
समीकरण से `E_("max") = 1/2m((qB_("max"))/m)^(2)`
`=1/2(q^(2)B^(2)r_("max")^(2))/m`
यहाँ पर `r_("max")=` डी के बाहर निकलने से पूर्व सबसे बड़े अर्ध वृत्त की त्रिज्या है|