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PHYSICS
व्यतिकरण किसे कहते हैं ? संपोषी तथा वि...

व्यतिकरण किसे कहते हैं ? संपोषी तथा विनाशी व्यतिकरण को प्राप्त करने हेतु आवश्यक शर्तों को व्युत्पन्न कीजिए। यदि यंत्र के द्विछिद्र प्रयोग में एकवर्गीय प्रकाश स्रोत के स्थान पर श्वेत प्रकाश स्रोत काम में ले तो व्यतिकरण फ्रिन्जों पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?

लिखित उत्तर

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व्यक्तिकरण - प्रकाश का व्यक्तीकरण अध्यारोपण के सिद्धांत पर आधारित है .. जब दो या दो से अधिक समान आवृत्ति की प्रकाश तरंगे जिनका आयाम समान या लगभग समान हो एवं जिनके मध्य कलांतर निश्चित हो, एक साथ किसी एक दिशा में माध्यम से गुजरती है तो उनके अध्यारोपण के कारण एक परिणामी तरंग की रचना होती है परिणामी तरंग का आयाम किन्ही स्थानों पर अधिकतम एवं किन्ही स्थानों पर न्यूनतम होता है , फलस्वरूप उन बिंदुओं पर परिणामी प्रकाश तरंगो की यह घटना व्यक्तिकरण कारन कहलाती है
संपोषी तथा विनाशी व्यक्तिकरण प्राप्त करने गति आवश्यक शर्ते -
माना कला सम्बन्ध स्त्रोतों से निकलने वाली दो समान आवृति की किसी प्रकाशीय तरंगे जिनके आयाम क्रमश `a_(1)` तथा `a_(2)` है के विस्थापन समीकरण -
`Y_(1)=a_(1) sin omegat` . . . .(1)
`Y_(2)=a_(2) sin (omegat +phi)` . . . . . (2)
एक ही दिशा में संचरित होती हुई परस्पर अध्यारोपित होती है जहाँ रंगो के मध्य कालान्तर है तथा `omega=2pin=(2pi)/(T)`, कोणीय आवृत्ति है तरंगो की आवृत्ति है T आवर्तकाल है
अध्यारोपण के सिंद्धांत से परिणामी तरंग का विस्थापन -
`Y=Y_(1)+Y_(2)` . . . . (3)
`Y=a_(1)sinomegat+a_(2)sin(omegat+phi)`
`Y=a_(1)sinomegat+a_(2)(sin omegacosphi+cos omegatsin phi)`
`Y=a_(1)sinomegat+a_(2)sinomegatcosphi+a_(2)cosomegat sin phi`
`Y=[a_(1)+a_(2)cosphi]sinomegat+a_(2)sinphi(cos omegat)`
माना
`a_(1)+a_(2)cos phi=Rcostheta` . . . (4)
`a_(2)sin phi=Rsin theta` . . . (5)
`Y=R cos thetasin omegat+Rsin theta cos omega`
`Y=R sin (omega t +theta)` . . . . .(6)
यह परिणामी तरंग का विस्थापन समीकरण हो जिसमे R - परिणामी का आयाम है तथा प्रारम्भिक कला कोण `theta` है
समीकरण (4) व (5) का वर्ग करके जोड़ने पर
`a_(1)^(2)+a_(2)^(2)cos^(2)phi+2a_(1)a_(2)cosphi=R^(2)cos^(2)theta`
`a_(1)^(2)sin^(2)phi" "=R^(2)sin^(2)theta`
`rArr" "a_(1)^(2)+a_(2)^(2)(cos^(2)phi+sin^(2)phi)+2a_(1)a_(2)cos phi`
`=R^(2)(cos^(2)theta+sin^(2)theta)`
`a_(1)^(2)a_(2)^(2)2a_(1)a_(2)cosphi=R^(2)`
`R=sqrt(a_(1)^(2)+a_(2)^(2)+2a_(1)a_(2)cos phi)` . . . . . .(7)
समीकरण (5) को समीकरण (4) में भाग देने पर -
`("Rs in" theta)/(E cos theta)=(a_(2) sin phi)/(a_(1)+a_(2) cosphi)`
`tan theta=(a_(2)sin phi)/(a_(1)+a_(2)cos phi)`
या `theta = tan^(-1)[(a_(2) sin phi)/(a_(1)+a_(2)cos phi)]` . . . .(8)
समीकरण (7) तथा (8) से यह स्पष्ट होता है कि परिणामी तरंग का आयाम तथा प्रारम्भिक कला कोण `theta` दोनों तरंगो के आयाम तथा उनके मध्य कालान्तर पर निर्भर करते है।
क्योंकि प्रकाश की तीव्रता तरंग को आयाम के वर्ग के समानुपाती होती है अतः
`Iprop R^(2)`
या `I=KR^(2)` (K समानुपाती नियतांक है ) . . . .(9)
या `I=K(a_(1)^(2)+a_(2)^(2)+2a_(1)a_(2)cos phi)`
`I=Ka_(1)^(2)+Ka_(2)^(2)+2sqrt(Ka_(1))xxsqrt(Ka_(2)) cos varphi`
परन्तु `Ka_(1)^(2)=I_(1)` तथा `Ka_(2)^(2)=I_(2)` जहाँ `I_(1)` तथा `I_(2)`
दोनों तरंगो की क्रमशः : तीव्रताएँ एवं उनके बीच कलान्तर पर निर्भर करती है।
स्थिति I : - `phi=0,2pi,4pi . . . . .2 n pi` अर्थात `pi` का समगुणज `(2n pi)` हो तब
परिणामी आयाम
`R=sqrt(a_(1)^(2)+a_(2)^(2)+2a_(1)a_(2)cos0)`
`R=sqrt(a_(1)^(2)+a_(2)^(2)+2a_(1)a_(2)xx1)`
`R=sqrt(a_(1)^(2)+a_(2)^(2)+2a_(1)a_(2))=sqrt((a_(1)+a_(2))^(2))`
`R=a_(1)+a_(2)` (अधिकतम)
तथा परिणामी तीव्रता
`I=I_(1)+I_(2)+2sqrt(I_(1))sqrt(I_(2))`
`I=(sqrt(I_(1)))^(2)+(sqrt(I_(2)))^(2)+2sqrt(I_(1)I_(2))`
`I=(sqrt(I_(1))+sqrt(I_(2)))^(2)` (अधिकतम)
इस अवस्था में सीक्तिकरण संपोषी होगा तथा पथान्तर
`(Delta)=n lamda` तथा समयांतर (T.D.)=nT होता `gE" "tgk_(1)n=0,1,2 . . . . .` है
स्थिति : 2 जब `phi=pi,3pi,5pi, . . . . (2pi+1)pi` का विषमगुणज `(2pi+1)pi` हो जहाँ `n=0,1,2, . . . .` है तब -
परिमामी आयाम
`R=sqrt(a_(1)^(2)+a_(2)^(2)+2a_(1)a_(2)cos pi)`
`R=sqrt(a_(1)^(2)+a_(2)^(2)+2a_(1)a_(2)xx - 1)`
`R=sqrt((a_(1)-a_(2))^(2))R=a_(1)=a_(2)` (न्यूनतम)
तथा परिणामी तीव्रता
`I=I_(1)+I_(2)+2sqrt(1_(1))sqrt(I_(2))cos pi`
`I=I_(1)+I_(2)-2sqrt(I_(1))sqrt(I_(2))`
`I=(sqrt(I_(1))-sqrt(I_(2)))^(2)-2sqrt(I_(1)I_(3))`
`I=(sqrt(I_(1))-sqrt(I_(2)))^(2) ` (न्यूनतम)
इस अवस्था में विनाशी व्यक्तिकरण होगा तथा पथान्तर
`(Delta)=(2n+1)lamda//2` एवं समयान्तर `=(2n+1)1/2`
होगा। जहाँ `n=0,1,2 . . . . `
यंत्र के द्विछिद्र प्रयोग में एक वर्णीय प्रकाश स्त्रोत के स्थान पर श्वेत प्रकाश करने पर केंद्रीय फ्रिंज सफेद या उसके चारो तरफ कुछ रंगीन फ्रिन्जें प्राप्त होती है।
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