द्रव्य कणों जैसे इलेक्ट्रॉन आदि की तरंग प्रकृति को सत्यापित करने के लिए सर्वप्रथम डेविसन तथा जर्मर ने प्रयोग किया । यह प्रयोग इलेक्ट्रॉनों का निकल किस्टल से प्रकीर्णन पर आधारित था । डेविसन तथा जर्मर द्वारा किए प्रयोग में लिए गए उपकरण को नीचे दर्शाया गया है -
उपकरण के निम्न तीन भाग होते हैं -
(1) इलेक्ट्रॉन गन
(2) लक्ष्य या निकल क्रिस्टल
(3) संसूचक (आयनन कक्ष )
इलेक्ट्रॉन गन - इलेक्ट्रॉन के उतसर्जन के लिए इसमें एक टंगस्टन का एक तंतु F होता है जिस पर बेरियम ऑक्साइड का लेप होता है । जिस कम विभव से गर्म करने पर इलेक्ट्रॉनों का उतसर्जन होगा है । तंतु के आगे दो डायक्रम `S_(1)` व `S_(2)` होते हैं जिनमें बारीक़ छिद्र होते हैं । जिनमें से इलेक्ट्रॉन गुजरने पर एक पतले पुंज का रूप धारण कर लेते हैं । इलेक्ट्रॉन की गति को परिवर्तित करने के लिए परिवर्ती विभव व्यवस्था लगी होती है ।
लक्ष्य या निकल क्रिस्टल - T एक निकल क्रिस्टल है जो विवर्तन ग्रेटिंग की तरह कार्य करता है । इस निकल क्रिस्टल को इलेक्ट्रॉन किरण पुंज के सापेक्ष घूमाने की व्यवस्था भी होती है ।
निकल के क्रिस्टल के परमाणुओं के मध्य की दूरी D = 2.15 `Å` होती है जो की इलेक्ट्रॉन पुंज से संबंध तरंग के तरंगदैर्ध्य की कोटि की होती है अर्थात विवर्तन की आवश्यक शर्ते का पालन होता है । यही कारण है की निकल क्रिस्टल एक विवर्तक के रूप कार्य करता है ।
(3) संसूचक (आयनन कक्ष ) - निकल क्रिस्टल से विवर्तित इलेक्ट्रॉन पुंज की तीव्रता नापने के लिए आयनन कक्ष (C ) होता है जिसे संसूचक कहते हैं । इसमें `SO_(2)` व `CO_(2)` गैसें भरी होती हैं । यह आयनन कक्ष गैल्वेनोमीटर G से जुड़ा होता है । यह आयनन कक्ष एक वृत्ताकार पैमाने पर लगा होता है जिसकी सहायता से इसे आपतित इलेक्ट्रॉन पुंज के सापेक्ष विभिन्न कणों पर घुमाया जा सकता है ।
जब विवर्तित इलेक्ट्रॉन पुंज आयनन कक्ष में पहुंचते है तो `CO_(2)` व `SO_(2)` गैस का आयनीकरण कर देता है । अर्थात आयनन कक्ष में आयन बन जाते हैं आयनों की संख्या इलेक्ट्रॉन पुंज की तीव्रता पर निर्भर करती है । आयनन कक्ष से एक गैल्वेनोमीटर (G) जुड़ा होता है जिससे उतपन्न धारा का मान ज्ञात किया जा सकता है ।
क्रियाविधि - सर्वप्रथम निश्चित विभव V देकर इलेक्ट्रॉन गन से इलेक्ट्रॉनों का उतसर्जन करते हैं । ये इलेक्ट्रॉन निकल क्रिस्टल से टकराते हैं तथा सभी संभव दिशाओं में विवर्तित हो जाते हैं । आयनन कक्ष (संसूचक ) को वृत्ताकार पैमाने के विभिन्न स्थानों पर रखकर विवर्तित इलेक्ट्रॉन पुंज की तीव्रता ज्ञात कर लेते हैं ।
इस प्रयोग को अलग - अलग विभवांतर V के साथ दोहराते हैं तथा विवर्तित इलेक्ट्रॉन पुंज की तीव्रता तथा प्रकीर्णन कोण `tetha` (आपतित किरण पुंज तथा विवर्तित किरण पुंज के माही का कोण ) के मध्य ध्रुवीय आलेख खींचते हैं जो निम्न प्रकार प्राप्त होते हैं -
उक्त ध्रुवीय आलेखों से स्पष्ट है की 54 व त्वरित इलेक्ट्रॉन पुंज `50^(@)` के प्रकीर्णन कोण पर संसूचक अधिकतम मान प्रदर्शित करता है अर्थात इलेक्ट्रॉन पुंज की तीव्रता अधिकतम प्राप्त होती है चित्र से स्पष्ट है की 54 वोल्ट पर एक शीर्ष का बनना यह प्रदर्शित करता है की इलेक्ट्रॉनों का विवर्तन हो रहा है और यह उच्छिष्ट पुनः 68 वोल्ट पर लुप्त हो जाता है
यदि द्रव्य तरंग परिकल्पना सही है तब Ni क्रिस्टल के परमाण्विक तलो से इन तरंगों का X - किरणों की लिए भी ब्रेग नियम प्रयुक्त होना चाहिए । चित्रानुसार निकल क्रिस्टल के लिए निकलवर्ती परमाणु के मध्य की दूरी D विवर्तन उच्छिष्ट का आपतित दिशा में कोण `theta` द्रव्य तरंग की तरंगदैर्ध्य `lambda` तथा विवर्तन की कोटि n हो तो
ब्रेग के नियमानुसार
`D sin theta = n lambda`
समीकरण (1) से निकल क्रिस्टल के लिए `D = 2.15`
`Å, theta = 50^(@)` तथा n = 1 रखने पर
`2.15 sin (50^(@)) = 1 xx lambda`
`implies lambda = 2.15 xx 0.766`
`lambda = 1.65 Å`
इस प्रकार इलेक्ट्रॉन मापन के द्रव्य तरंग का तरंगदैर्ध्य `1.65 Å` प्राप्त हुआ ।
डी - ब्रॉगली परिकल्पना के अनुसार इलेक्ट्रॉन पुंज की तरंगदैर्ध्य निम्न होती है -
`lambda = (12.27)/(sqrt(V)) Å` जहाँ V = विभवांतर
V = 54 वोल्ट रखने पर
`lambda = (12.27)/(sqrt(54)) Å`
`lambda = 1.67 Å`
निष्कर्ष - समी (2) व (3) से स्पष्ट है की ब्रेग के नियम से प्राप्त तरंगदैर्ध्य डी - ब्रॉगली की तरंगदैर्ध्य के तुल्य है । यह परिमाण डी - ब्रॉगली की परिकल्पना की समर्थन करता है । साथ ही इस बात की भी पुष्टि होती है । इलेक्ट्रॉन पुंज द्रव्य तरंगों की भांति व्यवहार करता है अर्थात इलेक्ट्रॉनों की तरंग प्रकृति की पुष्टि होती है ।