भूकम्प-आन्तरिक विवर्तनिक शक्तियों में भूकम्प भी एक विनाशक घटना है। भकम्प शब्द का अर्थ भू-सतह के कम्पन्न से है। कम्पन्न होने का कारण भूगर्भ में होने वाली कोई हलचल होती है.। जहाँ हलचल से कम्पन शुरू होते हैं उसे कम्प केन्द्र कहते हैं। कम्प-केन्द्र से शुरू होकर तरंगें चारों ओर फैलती जाती हैं। गहराई से चली तरंगें जब भूमि की सतह पर पहुँचती है तो सतह कभी-कभी आगे पीछे तो कभी-कभी ऊपर-नीचे होती है। भूकम्प का महत्त्व उसकी तीव्रता पर निर्भर करता है। भूकम्प को भूकम्पमापी द्वारा मापा जाता है। भूकम्प की तीव्रता को रिक्टर पैमाने पर व्यक्त किया जाता है। 4 इकाई तक भूकम्प हल्के होते हैं। 5.5 तक प्रबल, 6 इकाई से ऊपर के भूकम्प विनाशकारी माने जाते हैं। 7 के ऊपर के भूकम्प सर्वनाशी होते हैं। भूकम्पों की उत्पत्ति का कारण पृथ्वी के भीतर की बनावट में उत्पन्न असंतुलन होता है। असंतुलन प्राकृतिक या मानव निर्मित जलाशयों के दाब या विस्फोट आदि के कारण भी हो सकता है। वर्तमान में प्लेट विवर्तन सिद्धान्त के आधार पर भूकम्प की व्याख्या की जाती है। पृथ्वी की सतह पर 29 विवर्तनिक प्लेटें स्थित हैं। प्लेटों के किनारे रचनात्मक, विनाशी व संरक्षी तीन प्रकार के होते हैं। विनाशी किनारों पर ही अधिक परिमाण के, विनाशक भूकम्प आते हैं। उत्तरी भारत, तिब्बत तथा नेपाल में भूकम्प का कारण प्लेटों के टकराव को माना गया है। प्लेटों के किनारे विनाशी नहीं होने वाले भागों में भी भूकम्प आते हैं जिनकी व्याख्या करने में कठिनाई होती है। भारत को भूकम्प जोखिम के अनुसार 5 भागों में विभाजित किया गया है जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखण्ड के कुछ भाग सर्वाधिक जोखिम वाले माने गए हैं। पंजाब, हरियाणा व उत्तर प्रदेश के कुछ भागों को सबसे कम जोखिम का माना जाता है। कोलकाता न्यूनतम जोखिम का क्षेत्र होने पर भी वहाँ 1737 ई. में भयानक भूकम्प आया था, जिसमें 3 लाख के लगभग लोग मारे गये थे।

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