गर्भावस्था के दौरान यदि माँ का आर एच ऋणात्मक हो तथा गर्भस्थ शिशु आर एच धनात्मक हो तब प्रसव के दौरान विशेष ध्यान रखने की जरूरत है। प्रथम प्रसव के समय माता व भ्रूण का रक्त आापस में मिल जाता है। इस कारण भाती में आर. एच. प्रतिरक्षी का निर्माण होता है। प्रथम शिशु का जन्म सामान्य रूप से होता है। द्वितीय गर्भावस्था में भी यदि शिशु का आर एच धनात्मक हो तो पेचीदगी उत्पन्न हो सकती है। माता के शरीर में बने आर एच प्रतिरक्षी भ्रूण के रक्त में उपस्थित आर एच कारकों से प्रतिक्रिया करते हैं। रुधिर समूहन विधि द्वारा ये प्रतिरक्षी लाल रक्त कोशिकाओं को नष्ट कर रुधि लयणता (haemolysis) उत्पन्न करते हैं। इस कारण माता के गर्भ में भ्रूण की मृत्यु तक हो जाती है । यदि शिशु जीवित रहता है तो वह अत्यन्त कमजोर तथा हिपेटाइटिस से ग्रसित होता है। इस रोग को गर्भ रक्ताणकोरकता (erythroblastosis foetalis) कहते हैं।
इस रोग के उपचार हेतु प्रथम प्रसव के 24 घण्टों के भीतर माता को प्रति IgG प्रतिरक्षियों (anti Rh.D) का टीका लगाया जाता है। इन्हें रोहगम (Rhogam) प्रतिरक्षी कहा जाता है। ये प्रतिरक्षी माता के रक्त में मिश्रित भ्रूण की आर.एच. धनात्मक रक्त कोशिओं का विनाश कर माता के शरीर में प्रतिरक्षी उत्पन्न होने से रोकती है । कई बार इस रोग के उपचार के लिए शिशु का सम्पूर्ण रक्त रक्ताधान द्वारा बदला जाता है।