संक्रमण तत्व या d-ब्लॉक के तत्व-वे तत्व जिनमें परमाणु क्रमांक की क्रमशः वृद्धि के साथ-साथ विभेदी इलेक्ट्रॉन बाह्य कोश से पिछले कोश के d-उपकोश में प्रवेश करता है,d.ब्लॉक के तत्व कहलाते हैं। इन तत्वों के बाह्यतम कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास `ns^(1-2)` तथा उससे पिछले कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास `(n-1) s^(2),p^(6), d(1-10)` होता है। इस ब्लॉक में क्रमशः III-B, IV-B, V-B, VI-B, VII-B, VIII, VIII, VIII, I-B तथा II-B उपवर्गों के तत्व सम्मिलित होते हैं, जिनको अब 3 से 12 वर्गों में व्यक्त करते हैं। आवर्त सारणी में इन तत्वों की स्थिति दीर्घ आवतों में s-ब्लॉक और p-ब्लॉक के तत्वों के मध्य होती है। इस कारण इनको संक्रमण तत्व भी कहते हैं।
इन तत्वों की चार श्रेणियाँ क्रमश: चौथे, पाँचवें, छठे और सातवें आवर्त में हैं। पहली श्रेणी में विभेदी इलेक्ट्रॉन 3d, दूसरी श्रेणी में 4d, तीसरी श्रेणी में 5d तथा चौथी श्रेणी में 6 d-उपकोश में प्रवेश करता है।
3d-श्रेणी में `""_(21)Sc` से `""_(30)Zn` तक दस तत्व हैं।
4 d-श्रेणी में `""_(39)Y` से `""_(48)Cd` तक दस तत्व हैं।
5 d-श्रेणी में `""_(57)La` से `""_(80)Hg` तक दस तत्व हैं।
6d-श्रेणी के परमाणु क्रमांक 104 से 112 तक के तत्वों को खोज पिछले कुछ वर्षों में की गई है। ये तत्व सातवें आवर्त के तत्व है।
संक्रमण तत्वों के मुख्य अभिलक्षण (विशेषताएँ)-d-ब्लॉक के तत्वों (संक्रमण तत्वों) के मुख्य लक्षण अनलिखित हैं-
1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास-इन तत्वों में इलेक्ट्रॉन बाह्यतम कोश (n) से पिछले कोश, अर्थात् (n. – 1) के d-उपकोशों में भरते हैं। इन तत्वों के बाह्य कोश में 1 या 2 इलेक्ट्रॉन तथा उससे पिछले कोश में 9 से 18 इलेक्ट्रॉन तक होते हैं, जैसे-
`""_(21)Sc= 1s^(2),2s^(2)2p^(6),3s^(2)3p^(6)3d^(1),4s^(2)`
`""_(22)Ti= 1s^(2),2s^(2)2p^(6),3s^(2)3p^(6)3d^(2),4s^(2)`
`""_(23)V= 1s^(2),2s^(2)2p^(6),3s^(2)3p^(6)3d^(3),4s^(2)`
`""_(24)Cr= 1s^(2),2s^(2)2p^(6),3s^(2)3p^(6)3d^(5),4s^(1)`
(अपवाद)
`""_(25)Mn= 1s^(2),2s^(2)2p^(6),3s^(2)3p^(6)3d^(5),4s^(2)`
`""_(26)Fe= 1s^(2),2s^(2)2p^(6),3s^(2)3p^(6)3d^(6),4s^(1)`
`""_(27)Co= 1s^(2),2s^(2)2p^(6),3s^(2)3p^(6)3d^(7),4s^(2)`
`""_(28)Ni= 1s^(2),2s^(2)2p^(6),3s^(2)3p^(6)3d^(8),4s^(2)`
`""_(29)Cu= 1s^(2),2s^(2)2p^(6),3s^(2)3p^(6)3d^(10),4s^(1)`
(अपवाद)
`""_(30)Zn= 1s^(2),2s^(2)2p^(6),3s^(2)3p^(6)3d^(10),4s^(2)`
2. परमाणु त्रिज्या-किसी भी संक्रमण श्रेणी में बाएँ से दाएँ जाने पर वर्ग-3 (III B) से वर्ग 7 (VIII B) तक परमाणु त्रिज्या धीरे-धीरे कम होती जाती है। वर्ग 7 से वर्ग-10 तक तत्वों की त्रिज्याएँ लगभग समान रहती हैं तथा इसके पश्चात् वर्ग-12 (II-B) तक त्रिज्या का मान बढ़ता जाता है। इस क्रम की व्याख्या परिरक्षण प्रभाव के आधार पर की जा सकती है।
संक्रमण श्रेणी में बायीं से दायीं ओर जाने पर परमाणु क्रमांक बढ़ने के कारण नाभिकीय आवेश में वृद्धि होती है जो परमाणु त्रिज्या को घटाने का प्रयत्न करती है जबकि (n-1)d कक्षक में उपस्थित इलेक्ट्रॉन, बाह्यतम कोश `ns^(2)` के इलेक्ट्रॉनों को परिरक्षित (अर्थात् प्रतिकर्षित) करते है जिस कारण परमाणु त्रिज्या में वृद्धि होनी चाहिए, परन्तु ऐसा पाया गया है प्रारम्भ में (n-1)d उपकोश में आए इलेक्ट्रॉन द्वारा उत्पन्न परिरक्षण प्रभाव (प्रतिकर्षण बल), नाभिकीय आवेश में हुई लगभग · 85% वृद्धि को प्रतिसन्तुलित कर देता है। Cr से Ni तक के तत्वों में यह नाभिकीय आवेश को पूर्णतया सन्तुलित कर देता है जिस कारण परमाणु त्रिज्या लगभग समान रहती है। इसके पश्चात् इसका मान, नाभिकीय आवेश से कुछ अधिक हो जाने के कारण परमाणु त्रिज्या में वृद्धि हो जाती है।
3. परिवर्ती संयोजकता-ये तत्व परिवर्ती संयोजकता प्रदर्शित करते हैं। जैसे आयरन की संयोजकता फेरस यौगिकों में 2 और फेरिक यौगिकों में 3 होती है।
4. धात्विक प्रकृति-ये सभी तत्व धातु है क्योंकि इनके बाह्यतम कोश में 1 या 2 इलेक्ट्रॉन होते हैं। इन धातुओं के क्वथनांक, गलनांक तथा घनत्व ऊँचे होते है। ये सभी तत्व ऊष्मा तथा विद्युत के कुचालक होते हैं और मिश्रधातु बनाने का गुण भी व्यक्त करते हैं।
5. चुम्बकीय लक्षण-ये तत्व अधिकतर अनुचुम्बकीय होते हैं क्योंकि इनमें (n-1) d-उपकोश में प्राय: अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं। जब (n - 1) d उपकोश में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं होते हैं तो उस दशा में इनके आयन प्रतिचुम्बकीय गुण व्यक्त करते हैं।
6. रंगीन आयन व यौगिक बनाने की प्रवृत्ति-इन तत्वों के जिन आयनों में (n-1)d-उपकोश पूरा भरा नहीं होता अर्थात् (n-1)d-उपकोश में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, उनके आयन तथा यौगिक रंगीन होते हैं जैसे `Cu^(2+)` आयन (`d^(9)`) तथा इसके यौगिक नीले रंग के होते हैं।
7. ऑक्सीकरण अवस्थाएँ–अतिलघु प्रश्न संख्या-2 का उत्तर देखें।
8. उत्प्रेरकीय गुण -ये तत्व और इनके यौगिक उत्प्रेरक गुण प्रदर्शित करते हैं। इसका मुख्य कारण अपूर्ण (n-1)d-उपकोश होता है।
9. संकर आयन बनाने की प्रवृत्ति-इन तत्वों के आयनों में उचित ऊर्जा के रिक्त d-उपकोश उपलब्ध होने के कारण तथा आयनों पर उच्च धनावेश तथा आयनिक त्रिज्या छोटी होने के कारण, ये संकर आयन बनाने की विशेष प्रवृत्ति रखते हैं। जैसे- `[Fe(CN)_(6)]^(3-), [Fe(CN)_(6)]^(4-), [Cu(NH_(3))_(4)]^(2+)` आदि।
10. यौगिक की प्रकृति-ये तत्व वैद्युत-संयोजक तथा उपसहसंयोजक दोनों प्रकार के यौगिक बनाते हैं।
11. अनिश्चित अनुपात के यौगिक बनाने की प्रवृत्ति-जिन यौगिकों में तत्वों का अनुपात अनिश्चित होता है उन्हें अनिश्चित अनुपात के यौगिक कहते हैं। d-ब्लॉक के तत्वों में उनकी परिवर्ती संयोजकता के कारण इस प्रकार के यौगिक बनाने की प्रवृत्ति होती है जैसे फेरस ऑक्साइड का संघटन FeO न होकर `Fe_(0)"_(94)O` और `Fe_(0)"_(84)O` के मध्य बदलता रहता है।
Zn, Cd तथा Hg का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास सामान्य `(n - 1) d^(10)ns^(2)` से प्रदर्शित किया जाता है। इन तत्वों में कक्षक तलस्थ (सामान्य) अवस्था में तथा साधारण ऑक्सीकरण अवस्थाओं में भी पूर्णपूरित होते हैं अर्थात् इनकी परमाण्विक अवस्था अथवा किसी भी एक आयनिक अवस्था में उपकोश अपूर्ण नहीं होते हैं, इसलिए इन्हें संक्रमण तत्व नहीं कहा जा सकता।