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CHEMISTRY
संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त की संक्षेप में ...

संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।

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संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त की मुख्य अभिधारणाएँ निम्नलिखित हैं -
(i) सर्वप्रथम केन्द्रीय धातु परमाणु अपनी ऑक्सीकरण संख्या के अनुरूप इलेक्ट्रॉन त्यागकर (शून्य ऑक्सीकरण संख्या को छोड़कर) धनायन बनाता है। संकुल यौगिकों में केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन के पास उचित लिगेण्डों के साथ उपसहसंयोजक आबन्ध बनाने के लिए आवश्यकतानुसार रिक्त कक्षक होते हैं। ये रिक्त कक्षक केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन की समन्वय (उपसहसंयोजन) संख्या के बराबर होते हैं। (ii) केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन के ये रिक्त कक्षक (s, p या d) संकरित होकर समान संख्या में समान ऊर्जा के नए संकरित कक्षक देते हैं। इन संकरित कक्षकों की ज्यामिति निश्चित होती है, जो समतली वर्गाकार, चतुष्फलकीय, अष्टफलकीय आदि हो सकती है। ये रिक्त संकरित कक्षक, लिगेण्ड के दाता परमाणु के इलेक्ट्रॉन युग्म कक्षकों से अतिव्यापन करके, उपसहसंयोजन आबन्ध बनाते हैं। इस प्रकार केन्द्रीय धातु आयन संकरित कक्षक और लिगेण्ड के मध्य बने संकुल अणु या आयन की एक निश्चित ज्यामिति होती है। (iii) केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन के संकरण में भाग लेने वाले d-कक्षक अन्दर के अर्थात् (n-1)d या बाह्यतम nd कक्षक हो सकते हैं। उदाहरणार्थ-अष्टफलकीय संकरण में भाग लेने वाले कक्षक दो (n-1)d, एक ns तथा तीन `np (d^2sp^3" के रूप में ")` अथवा एक ns, तीन np तथा दो `nd (sp^3 d^2 " के रूप में" )` हो सकते हैं। (iv) अन्दर वाले d-कक्षकों का प्रयोग करने वाले संकुल यौगिकों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या कम होती है। इन्हें आन्तरिक कक्षक, निम्न चक्रण या चक्रण युग्मित जटिल यौगिक (संकुल) कहते हैं। बाहातम d-कक्षकों का प्रयोग करने वाले संकुल यौगिकों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या अधिक होती है। इन्हें बाह्यतम कक्षक, उच्च चक्रण या चक्रण मुक्त - (spin free) संकुल यौगिक कहते हैं। (v) प्रत्येक लिगेण्ड के पास कम-से-कम एक कक्षक होता है जिसमें एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित होता है जो धातु के रिक्त संकरित कक्षक के साथ अतिव्यापन करके धातु-लिगेण्ड उपसहसंयोजन आबन्ध बनाता है। (vi) लिगण्डों के केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन के निकट आने पर केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन के रिक्त संकरित कक्षक लिगेण्ड के भरे हुए कक्षकों के साथ अतिव्यापन करके लिगेण्ड व धातु के बीच उपसहसंयोजन "आबन्ध बनाते हैं। इन आबन्धों की संख्या केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन के द्वारा उपलब्ध रिक्त कक्षकों की संख्या पर निर्भर करती है। (vii) केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन के अन्दर वाले कक्षकों में उपस्थित इलेक्ट्रॉन आबन्ध बनाने में भाग नहीं लेते हैं। (viii) यदि लिगेण्ड प्रबल इलेक्ट्रॉन युग्म दाता है तो यह धातु आयन के इलेक्ट्रॉन का पुनर्विन्यास (हुण्ड नियम के विरुद्ध) करके, अयुग्मित इलेक्ट्रॉन को युग्मित कर देता है, जिससे अधिक संख्या में रिक्त d-कक्षक संकरण में भाग लेने को उपलब्ध हो जाते हैं। इस प्रकार इलेक्ट्रॉन के युग्मन से चुम्बकीय आघूर्ण कम हो जाता है, जिससे बनने वाले संकुल को निम्न चक्रण संकुल या आन्तरिक कक्षक संकुल या चक्रण युग्मित संकुल कहते हैं। प्रबल लिगेण्ड:
`NCS^(-) lt Py lt NH_3 lt en lt bipy lt NO_2^(-) lt CN^(-) lt CO`
इसके विपरीत जब दुर्बल इलेक्ट्रॉन युग्म दाता होता है तो वह धातु के आयन के अयुग्मित इलेक्ट्रॉन का युग्मन नहीं कर सकता। अत: अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की संख्या अधिक होने से चुम्बकीय आघूर्ण अधिक हो जाता है। इस स्थिति में बाह्य कक्षक (d) प्रयुक्त होता है जिससे बनने वाले संकुल को उच्च चक्रण संकुल या बाह्य कक्षक संकुल या चक्रण मुक्त संकुल कहते हैं।
दुर्बल लिगेण्ड :
`I^(-) lt Br^(-) lt Cl^(-) lt NO_3^(-) lt F^(-) lt OH^(-) lt C_2H_5OH lt C_2O_4^(2-) lt H_2O`
अतः आन्तरिक कक्षकों के प्रयुक्त होने पर बनने वाले संकुल निम्न चक्रण संकुल तथा बाहरी कक्षकों के प्रयुक्त होने पर बनने वाले संकुल उच्च चक्रण संकुल कहलाते हैं।
(ix) यदि संकुल यौगिक में एक या अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं तो यह अनुचुम्बकीय होता है तथा यदि सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं तो यह प्रतिचुम्बकीय होता है। IUPAC नाम
(i) `K_3 [Al (C_2O_4)_3]` पोटैशियम ट्राइऑक्सैलेटोऐलुमिनेट(III) (ii) `K2 [Zn(OH)_4]` पोटैशियम टेट्राहाइड्रॉक्सोजिंकेट(II)।
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