लकड़ी की कोई बेलनाकार वस्तु जैसे पेंसिल लीजिए और एक मोटे तार का टुकड़ा लीजिए। तार के एक सिरे को पेंसिल के बीच में दो-तीन बार लपेटिए। तार के बाकी हिस्से को पेंसिल के लंबवत रहने दीजिए। चित्र (a) के अनुसार तार के स्वतंत्र सिरे को मोड़कर एक हुक बना लीजिए। ऐलुमिनियम की पन्नी की लगभग 5-6 सें०मी० लंबी लेकिन पतली (लगभग 1 सें०मी० चौड़ी) पट्टी लीजिए। इंसे मोड़कर तार के बनाए हुए हुक पर इस प्रकार रखिए कि तार के हुक के दोनों ओर मुड़ी हुई पट्टी स्वतंत्रतापूर्वक लटकी रहे। इस व्यवस्था को काँच के किसी बर्तन में इस प्रकार रखिए कि तार तथा ऐलुमिनियम की पट्टी बर्तन की दीवारों या पेंदी
को स्पर्श न करे। ऐलुमिनियम की पन्नी की एक छोटी-सी गेंद बनाकर पेंसिल पर लिपटे तार के सिरे (टिप) पर लगा दीजिए। किसी आवेशित वस्तु जैसे काँच की छड़ या थर्मोकोल की पट्टी को ऐलुमिनियम की गेंद के संपर्क में लाइए। आप देखेंगे कि आवेशित वस्तु के ऐलुमिनियम की गेंद को स्पर्श करते ही ऐलुमिनियम की पट्टी की दोनों परतें (पत्तियाँ) अपसारित हो जाती हैं। यह (चित्र (b) अनुसार) ऐलुमिनियम की पट्टी, धातु का तार तथा ऐलुमिनियम की गेंद, सब एक-दूसरे के संपर्क में हैं। जब ऐलुमिनियम की गेंद को आवेशित वस्तु से स्पर्श कराते हैं, तो ऐलुमिनियम की पट्टी की दोनों परतें (पत्तियाँ) चालन के कारण समान आवेश उपार्जित कर लेती हैं। इस प्रकार वे एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करती हैं तथा पट्टी की दोनों पत्तियाँ अपसारित हो जाती हैं। यह क्रियाकलाप विद्युतदर्शी के कार्यकारी सिद्धांत की व्याख्या करता है।