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BIOLOGY
जीवन की उत्पत्ति से सम्बन्धित ओपेरिन सिद...

जीवन की उत्पत्ति से सम्बन्धित ओपेरिन सिद्धान्त का वर्णन कीजिए।

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जीव रसायन उद्विकास मत (Naturalistic theory or Bio-chemical evolution theory)-इस मत के अनुसार जीवन की उत्पत्ति निर्जीव पदार्थों से हुई है, लेकिन वर्तमान वातावरणीय परिस्थितियाँ जीवन उत्पत्ति के लिए उपयुक्त नहीं हैं। आदि पृथ्वी (primitive earth) के वातावरण में करोड़ों वर्षों तक अनेकानेक भौतिक-रासायनिक प्रक्रियाएँ (physio-chemical processes) चलती रहीं। इनसे पहले अकार्बनिक तथा बाद में कार्बनिक अणुओं/यौगिकों का निर्माण होता रहा। इनमें परस्पर क्रिया-अभिक्रियाओं के फलस्वरूप पहले सरल तथा बाद में जटिल कार्बनिक पदार्थों का निर्माण हुआ। इन प्रक्रियाओं के फलस्वरूप ऐसे पदार्थ बने जो जीवद्रव्य के घटक बने।
प्रकृतिवाद को ओपेरिन (Oparin, 1924) तथा हैल्डेन (Haldane, 1929) ने पदार्थवाद (materialistic theory) या जीवन की जैव-रासायनिक उत्पत्ति (bio-chemical origin of life) के रूप में प्रस्तुत किया।
ओपेरिन के अनुसार पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति
(Origin of Life on Earth according to Oparin)
प्रथम चरण-परमाणु अवस्था (First Step : Atomic Stage) पृथ्वी प्रारम्भिक अवस्था में एक ज्वलित वाष्प पुंज के रूप में थी। इसमें सभी तत्त्व परमाणु के रूप में विद्यमान थे। पृथ्वी का तापमान लगभग 5000-6000°C था। धीरे-धीरे पृथ्वी का ताप कम होने से भारी परमाणु जैसे ताँबा, निकिल, लोहा आदि पृथ्वी के केन्द्र में एकत्र हुए जिससे पृथ्वी का केन्द्रीय भाग कोर (core) बना है, मध्यम भार के परमाणुओं से कोर का आवरण (shell of core) बना। जबकि हल्के परमाणु जैसे हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, कार्बन, ऑक्सीजन आदि से आदि वायुमण्डल बना। आज भी पृथ्वी का केन्द्रीय भाग पिघले हुए लावा के रूप में है। द्वितीय चरण-अणु अवस्था (Second Step : Molecular Stage)
पृथ्वी धीरे-धीरे ठण्डी हो रही थी। आदि वायुमण्डल अपचायक (reducing) था। सबसे हल्के तथा क्रियाशील परमाणु हाइड्रोजन ने विभिन्न तत्त्वों से संयोग करके जल (`H_2 O`), मेथेन `(CH_4)` तथा अमोनिया `(NH_3)`, हाइड्रोजन सायनाइड (HCN) आदि का निर्माण किया। जल तरल रूप में न होकर जलवाष्प रूप में था। जलवाष्प ठण्डा होने पर जल के रूप में पृथ्वी पर बरसने लगी और शनैः शनैः पृथ्वी ठण्डी होती गई। यह क्रम निरन्तर चलता रहा, इसके फलस्वरूप आदि पृथ्वी का स्थलमण्डल (lithosphere) तथा आदि सागरों का निर्माण हुआ। आदि वातावरण में ऑक्सीजन के स्वतन्त्र परमाणु नहीं रहे। तृतीय चरण-कार्बनिक यौगिकों का बनना (Third Step : Formation of Organic Compounds) सम्भवतया आदि वायुमण्डल में मीथेन (`CH_4` ) सबसे पहले बनने वाला कार्बनिक यौगिक था। मीथेन से एथेन, प्रोपेन, ... ऐसीटिलीन, ऐल्कोहॉल, ऐल्डिहाइड्स, कीटोन्स तथा कार्बनिक लवणों का निर्माण हुआ। विभिन्न कार्बनिक यौगिकों के बहुलीकरण (polymerization) तथा संघनन (condensation) के फलस्वरूप निम्नलिखित जटिल यौगिक बने होंगे (1) शर्कराएँ (sugars), (2) ग्लिसरॉल (glycerol), (3) वसीय अम्ल (fatty acids), (4) ऐमीनो अम्ल (amino acids), (5) पिरिमिडीन (pyrimidine), (6) प्यूरीन (purines) आदि।

सूर्य की पराबैंगनी किरणों (ultraviolet rays), एवं विद्युत विसर्जन के फलस्वरूप मुक्त ऊर्जा, अन्तरिक्षी किरणों (cosmic rays) तथा ज्वालामुखियों के फटने से उत्पन्न ताप ऊर्जा जटिल रासायनिक पदार्थों के संश्लेषण के लिए प्राप्त होती रही होगी। चतुर्थ चरण—विशिष्ट जटिल कार्बनिक पदार्थों का निर्माण (Fourth Step : Formation of Special Complex Organic Compounds) शर्कराओं के बहुलीकरण से स्टार्च (starch), सेलुलोस (cellulose) तथा अन्य जटिल .कार्बोहाइड्रेट्स (carbohydrates) का निर्माण हुआ। ग्लिसरॉल तथा वसीय अम्लों (glycerol and fatty acids) के संयोग से वंसाओं (fats) का निर्माण हुआ। ऐमीनो अम्लों के बहुलीकरण से जटिल प्रोटीन्स का निर्माण हुआ। इनमें से कुछ प्रोटीन के अणु रासायनिक क्रियाओं के उत्प्रेरण का कार्य करने लगे। ऐसे उत्प्रेरकों को एन्जाइम (enzyme) कहा गया। प्यूरीन (purine), पिरिमिडीन (pyrimidine), फॉस्फोरिक अम्ल तथा पेन्टोस शर्करा अणुओं के मिलने से न्यूक्लिक अम्ल (nucleic acid) का निर्माण हुआ। आदि सागर में उपस्थित विभिन्न कार्बनिक पदार्थ मिश्रण के रूप में उबल रहे थे। हैल्डेन (Haldane, 1920) ने आदि सागर में उपस्थित कार्बनिक यौगिकों के इस जटिल मिश्रण को गर्म । सूप (prebiotic soup) कहा। . पंचम चरण-कोलॉइड्स, कोएसरवेट्स तथा न्यूक्लियोप्रोटीन्स का निर्माण (Fifth Step : Formation of Collolds, Coacervates and Nucleoproteins) आदि सागर के गर्म पूर्वजीवी सूप में उपस्थित कार्बनिक यौगिकों के अणुओं ने परस्पर अभिक्रिया करके कोलॉइडी कणों (colloidal particles) का निर्माण किया। प्रोटीन्स से बने कोलॉइडी कणों को सिडनी फॉक्स (Sydney Fox, 1964) ने माइक्रोस्फीयर्स (microspheres) कहां। विरोधी विद्युत आवेशयुक्त कोलॉइडी कणों के. परस्पर मिलने से कोएसरवेट्स (coacervates) का निर्माण हुआ। कोएसरवेट्स अपनी सतह से जल का अधिशोषण (absorption) करके आवश्यक कला (membrane) का भी निर्माण करती थीं। कोएसरवेट्स किण्वन द्वारा ऊर्जा प्राप्त करते थे। इनमें गुणन (multiplication) द्वारा संख्या वृद्धि होती थी।
न्यूक्लिक अम्ल तथा प्रोटीन के मिलने से न्यूक्लियोप्रोटीन्स (nucleoproteins) का निर्माण हुआ। कुछ न्यूक्लिक अम्ल के अणु अपने चारों ओर प्रोटीन्स का आवरण बन जाने के कारण वाइरस (virus) जैसी संरचनाओं में बदल गए होंगे। जीन (gene) न्यूक्लिक अम्लों से तथा गुणसूत्र न्यूक्लियोप्रोटीन्स से बने होते हैं। गुणसूत्र को जीवधारी की जन्मपत्री (blueprint) माना जाता है।
वास्तव में न्यूक्लिक अम्ल (nucleic acid) बनने की क्रिया आदि सागर में एक महत्त्वपूर्ण घटना रही क्योंकि इन पदार्थों में अपने जैसे अणुओं के संश्लेषण का विशिष्ट गुण होता है। अत: जनन सम्भव हो गया। षष्ठम चरण-आदि कोशिकाओं का निर्माण (Sixth Step : Formation of Primitive Cells)

ओपेरिन के अनुसार, कोएसरवेट्स (coacervates) द्वारा न्यूक्लियोप्रोटीन्स को ग्रहण कर लेने के फलस्वरूप आदि कोशिकाओं (primitive cells) या आदि जीव (primordial life) की उत्पत्ति हुई होगी। एक अन्य मत के अनुसार न्यूक्लियोप्रोटीन्स स्वभाव से चिपचिपे होते हैं, इस कारण इनके चारों ओर विभिन्न कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थों के एकत्र हो जाने से आद्य कोशिकाओं (primitive cells) का निर्माण YOUNG EARTH लगभग 3.7 अरब वर्ष पूर्व हुआ होगा।
ऐसा माना जाता है कि आद्य कोशिकाएँ रासायनिक परपोषी (chemoheterotrophic) रही होंगी। ये अपने आस-पास उपस्थित कार्बनिक पदार्थों को भोजन के रूप में ग्रहण करके किण्वन द्वारा ऊर्जा प्राप्त करती रही होंगी। आद्य कोशिकाएँ आजकल मिलने वाली परपोषी पूर्वकेन्द्रकीय या प्रोकैरियोटिक (prokaryotic) कोशिकाओं की तरह रही होंगी। परपोषी आद्य कोशिकाओं से पहले रसायनसंश्लेषी स्वपोषी कोशिकाओं का विकास हुआ और फिर पर्णहरित के बन जाने से प्रकाश संश्लेषी स्वपोषी पूर्वकेन्द्रकीय कोशिकाओं की उत्पत्ति हुई होगी। अफ्रीका की 3.2 अरब वर्ष पुरानी चट्टानों से केन्द्रकरहित आर्किओस्फीरॉएड्स बारबोंनेन्सिस (Archaeospheroides barbertonensis) नामक जीवाश्म प्राप्त हुए हैं। ये नीले-हरे शैवाल के समान होते हैं। इनको मोनेरा (monera) जगत में रखा गया है। प्रकाश संश्लेषण क्रिया के फलस्वरूप ऑक्सीजन क्रान्ति हुई जिसके फलस्वरूप कोशिकाएँ ऑक्सी श्वसन द्वारा ऊर्जा प्राप्त करने लगीं।
_(i) आदि वायुमण्डल की अमोनिया को `O_2 `ने जल तथा नाइट्रोजन में विघटित किया।
(ii) आदि वायुमण्डल की मीथेन को `O_2` ने जल व `CO_2` में विघटित किया। `CO_2` प्रकाश संश्लेषण क्रिया हेतु उपलब्ध होने लगी, (iii) वायुमण्डल अपचायक के स्थान पर ऑक्सीकारक हो गया।
(iv) पृथ्वी से 15 मील ऊपर ओजोन की पर्त बन गयी। सप्तम चरण-सुकेन्द्रकीय कोशिकाओं की उत्पत्ति (Seventh Step : Formation of Eukaryotic Cells)
लगभग 1.5 अरब वर्ष पहले पूर्वकेन्द्रकीय कोशिकाओं से सुकेन्द्रकीय कोशिकाओं की उत्पत्ति हुई। ओपेरिन के अनुसार, सुकेन्द्रकीय कोशिकाओं की उत्पत्ति जैव विकास के फलस्वरूप पूर्वकेन्द्रकीय कोशिकाओं से हुई है, जबकि वालिन (Wallin, 1920), मारगुलिस (Margulis, 1970) आदि के सहजीविता मतानुसार अनेक पूर्वकेन्द्रकीय कोशिकाओं के सहजीवन के फलस्वरूप सुकेन्द्रकीय कोशिकाओं की उत्पत्ति हुई। कोशिकाओं में उपस्थित क्लोरोप्लास्ट, माइटोकॉण्ड्रिया आदि अंगकों में स्वद्विगुणन की क्षमता होने से सहजीविता मत की पुष्टि होती है।
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