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योग्यतम की उत्तरजीविता किसका मूल विचार थ...

योग्यतम की उत्तरजीविता किसका मूल विचार था

लिखित उत्तर

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जैव विकास (Organic Evolution)
परिवर्तन के साथ अवतरण. (descent with change or modifications) जैव विकास की मौलिक कल्पना है। इसके अनुसार जीव-जातियों की सन्तानों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी वातावरणीय परिस्थितियों के अनुसार कुछ-न-कुछ परिवर्तन होते रहते हैं जिनसे सहस्रों वर्षों में अधिक संगठित व जटिल नई जातियाँ बनती रहती हैं। अतः आदिकालीन निम्न श्रेणी के जीवों में क्रमिक परिवर्तनों द्वारा अधिकाधिक जटिल जीवों की उत्पत्ति को ही कार्बनिक विकास या जैव विकास कहते हैं।
डार्विनवाद अथवा प्राकृतिक चयन सिद्धान्त (Darwinism or Theory of Natural Selection)
जैव विकास का प्राकृतिक चयन सिद्धान्त प्रस्तुत करने से पूर्व डार्विन ईश्वर द्वारा सृष्टि की रचना के सिद्धान्त को मानते थे। 22 वर्ष की आयु में डाविन को ब्रिटिश सरकार के विश्व सर्वेक्षण जहाज बीगल (H.M.S. Beagle) द्वारा अनेक के वातावरण तथा वहाँ पाए जाने वाले जीवधारियों, जीवाश्मों, चट्टानों आदि का अध्ययन करने का अवसर प्राप्त हुआ। इसके पश्चात् डार्विन इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि पृथ्वी पर जो जाति जैसी आज दिखाई देती है, वह प्रारम्भ से ही ऐसी नहीं थी।
अल्फ्रेड वैलेस (Alfred Wallace) ने दक्षिण पूर्वी एशिया तथा दक्षिण अमेरिका का भ्रमण करके प्रकृति में होने वाले प्राकृतिक चयन का अध्ययन करके "जीवों की किस्मों में मूल दशा से अनिश्चित रूप में बदल जाने की प्रवृत्ति" नामक लेख लिखा। माल्थस (T.R. Malthus, 1838) ने जनसंख्या के सिद्धान्त लेख प्रकाशित किया। वैलेस तथा डार्विन इस लेख से प्रभावित हुए।
- चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin) तथा अल्फ्रेड रसेल वैलेस (Alfred Russel Wallace) ने सन् 1858 में जीव-जातियों की उत्पत्ति नामक लेख प्रकाशित किया। सन् 1859 में डार्विन ने अपनी पुस्तक .प्राकृतिक चयन द्वारा जातियों की उत्पत्ति. (Origin of Species by means of Natural Selection) में अपने सिद्धान्त की व्याख्या प्रस्तुत की।
डार्विन सिद्धान्त की व्याख्या निम्नलिखित तथ्यों (facts) तथा प्रेक्षणों (observations) के आधार पर की गई है
1. जीवों में सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता (Enormous rate of fertility in living beings)- प्रत्येक जीव में अपनी प्रजाति को बनाए रखने के लिए सन्तानोत्पत्ति की अपार क्षमता होती है, जैसे
(i) एक खरगोश एक वर्ष में चार बार बच्चे देता है और हर बार में चार से छ: तक बच्चे होते हैं। बच्चे छह माह में वयस्क होकर जनन आरम्भ कर देते हैं।
(ii) एक समुद्री सीपी एक वर्ष में 60,00,000 तक अण्डे देती है, किन्तु इसके सारे अण्डे वयस्क अवस्था तक नहीं पहुंच पाते।
(iii) हाथी में सन्तानोत्पत्ति की दर बहुत ही कम होती है। 30 वर्ष से 90 वर्ष की आयु तक औसतन एक मादा हाथी 6-7 सन्तान उत्पन्न करती है। यदि एक जोड़े से पैदा होकर सब सन्तानें जीवित रहें और इसी प्रकार जनन करती रहें तो गणितीय गणना के अनुसार 750 वर्षों में पृथ्वी पर लगभग दो करोड़ हाथी हो जाएँगे।
(iv) पिछले 40 वर्षों में पृथ्वी पर मानव जनसंख्या लगभग दोगुनी हो गई है। अगर एक हजार वर्ष तक आबादी इसी प्रकार अनवरत बढ़ती रहे तो मानव के लिए भी पृथ्वी पर खड़े होना दूभर हो जाएगा। 2. प्रत्येक जीव-जाति की सन्तुलित आबादी (Balanced population of every species)-उपर्युक्त उदाहरणों से ऐसा प्रकट होता है कि पृथ्वी पर एक ही जीव-जाति कुछ वर्षों में आधिपत्य स्थापित कर सकती है, किन्तु ऐसा नहीं होता क्योंकि किसी भी जाति के सभी सदस्य जीवित नहीं रहते। जीवन-संघर्ष के फलस्वरूप जातियों की आबादी या समष्टि (population) लगभग निश्चित तथा सन्तुलित बनी रहती है। यह बात दूसरी है कि मनुष्य ने अपनी बुद्धि के बल पर अनेक प्राकृतिक कारकों पर : नियन्त्रण कर लिया है और इस कारण मानव आबादी निरन्तर बढ़ती जा रही है।
3.जीवन-संघर्ष (Struggle for existence)—सभी जीव भोजन, सुरक्षा तथा उचित आवास प्राप्त करने के लिए संघर्ष मध्य जीवन-संघर्ष जीवनपर्यन्त चलता रहता है। प्रत्येक जीवधारी जीवनपर्यन्त सजातीय सदस्यों, विभिन्न जीव-जातियों तथा साथ ही वातावरण के साथ संघर्षरत रहता है। इसी को जीवन-संघर्ष कहते हैं। जीवन-संघर्ष सजातीय (intraspecific), अन्तर्जातीय(interspecific) तथा वातावरणीय (environmental) प्रकार का होता है।
4.विभिन्नताएँ व उनकी वंशागति (Variations and their inheritance)-समजात जुड़वाँ (identical twins) को छोड़कर लिंगी जनन द्वारा उत्पन्न एक जाति के दो सदस्य समान नहीं होते। इनमें कुछ-न-कुछ विभिन्नताएँ अवश्य होती हैं। इन विभिन्नताओं में कुछ जीवन-संघर्ष के लिए लाभदायक, कुछ निरर्थक तथा कुछ हानिकारक होती हैं। विभिन्नताएँ दैहिक या जननिक होती हैं। जननिक विभिन्नताएँ वंशागत होती हैं। लाभदायक विभिन्नताओं वाले जीव जीवन-संघर्ष में सफल होते हैं और जनन द्वारा सन्तानोत्पत्ति करके संख्या वृद्धि करते रहते हैं।
5. योग्यतम की उत्तरजीविता तथा प्राकृतिक चयन (Survival of the fittest and natural selection) जीवन-संघर्ष में सफल जीवधारियों को सन्तान उत्पन्न करने के अधिक अवसर प्राप्त होते हैं, इससे जो जीवधारी अपने वंश या जाति को चलाने में समर्थ होते हैं, योग्यतम (fittest) कहलाते हैं। अयोग्य सदस्य समय-समय पर नष्ट होते रहते हैं। डार्विन के अनुसार योग्यतम जीवों का प्रकृति चयन करती है। डार्विन ने इसे प्राकृतिक चयन (natural selection) तथा हरबर्ट स्पेंसर (Herbert Spencer) ने योग्यतम की उत्तरजीविता (survival of the fittest) कहा।
6. बदलते वातावरण के प्रति अनुकूलन (Adaptation to environmental change)- वातावरण में निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। जीवधारियों में परिवर्तनशील वातावरण के अनुरूप संरचना, कार्यिकी तथा स्वभाव में अनुकूलन की क्षमता होती है। अनुकूलन के फलस्वरूप जो जीवधारी जीवन-संघर्ष में सफल होते हैं, जीवित रहते हैं जो जीवधारी स्वयं को वातावरण से अनुकूलित नहीं कर पाते जीवन की किसी न किसी अवस्था में नष्ट हो जाते हैं। अनुकूलन के कारण वर्तमान पीढ़ी पूर्व पीढ़ी की अपेक्षा अधिक सफलतापूर्वक जीवनयापन करती है।
7. नई जाति की उत्पत्ति (Origin of new species)-डार्विन के अनुसार, जीवों की जितनी भी जातियाँ जीवित हैं या जीवाश्म (fossils) के रूप में पायी जाती हैं, सभी प्राकृतिक चयन के फलस्वरूप उत्पन्न हुई हैं। किसी जीव में पीढ़ियों तक निरन्तर जीवन-संघर्ष तथा परिवर्तन होते रहने के कारण वह जीव प्रत्येक पीढ़ी में अपने पूर्वजों से कुछ भिन्न होता जाता है। एक समय ऐसा आता है जब वह अपने पूर्वजों से इतना अधिक भिन्न हो जाता है कि उसको एक नई जाति का स्थान प्राप्त हो जाता है। यदि हम चीता, तेंदुआ, शेर, बिल्ली आदि का अध्ययन करें तो हम देखते हैं कि इनमें अनेक समानताएँ हैं। इससे प्रदर्शित होता है कि ये सभी . प्रजातियाँ समान पूर्वज से विकसित हुयी होंगी। विभिन्न वातावरण में रहने के कारण इनमें इतने अधिक परिवर्तन हो गए कि ये अलग-अलग जातियों के रूप में स्थापित हो गयी हैं।
.उपर्यक्त तथ्यों के आधार पर डार्विन ने नई जातियों की उत्पत्ति (origin of new species) का सिद्धान्त प्रस्तुत किया।
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