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BIOLOGY
जैव विकास के पक्ष में जीवाश्म विज्ञान के...

जैव विकास के पक्ष में जीवाश्म विज्ञान के प्रमाणों को समझाइए।

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जैव विकास (Evolution) एक सतत चलने वाली (continuous process) अत्यन्त धीमी प्रक्रिया है, जो हजारों लाखों वर्षों में पूर्ण होती है। अनेक प्रमाण जैव विकास को प्रमाणित करते हैं।
जैव विकास के प्रमाण
(Evidences for Evolution) निम्नलिखित प्रमाणों (evidences) से जैव विकास को प्रमाणित किया जा सकता है
(I) जीवाश्म विज्ञान से प्रमाण, (II) संयोजी कड़ियों से प्रमाण, (III) जन्तुओं व पादपों के भौगोलिक वितरण से प्रमाण, (IV) अवशेषी अंगों से प्रमाण, (V) समजात तथा समवृत्ति अंगों से प्रमाण, (VI) भ्रौणिकी से प्रमाण तथा (VII) शरीर-क्रिया विज्ञान एवं जीव-रसायन से प्रमाण। (I) जीवाश्म विज्ञान से प्रमाण (Evidences from Palaeontology) जैव विकास के प्रमाणों में जीवाश्म विज्ञान से प्राप्त प्रमाण सबसे प्रबल व स्पष्ट हैं, क्योंकि जीवाश्म प्राचीनकालीन जीवधारियों के अवशेष होते हैं। पृथ्वी पर पूर्वकालों में पाए जाने वाले जीवधारियों के अवशेष चट्टानों में परिरक्षित पाए जाते हैं, इनको जीवाश्म (fossils) कहते हैं। जीवाश्मों की आयु का अनुमान चट्टानों में पाए जाने वाले रेडियोधर्मी पदार्थों से किया जाता है। जीवाश्म, स्तरित या तलछटी चट्टानों (stratified rocks) में अधिक मिलते हैं। विभिन्न आयु (ages) की चट्टानों से प्राप्त जीवाश्मों (fossils) के अध्ययन से जैव विकास का निश्चित ज्ञान होता है। इन चट्टानों से प्राप्त जीवाश्मों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि अपृष्ठवंशी (invertebrates) जन्तुओं से पृष्ठवंशी (vertebrates) जन्तुओं का विकास हुआ है। इसी प्रकार पहले निम्न श्रेणी के तथा बाद में उच्च श्रेणी के जीवों का विकास हुआ। जीवाश्मों की सहायता से अनेक जन्तुओं तथा पौधों के विकास क्रम की पूर्ण जानकारी प्राप्त हो चुकी है।

जीवाश्म के रूप में पक्षियों का एक ऐसा भी पुरखा मिला है जिसे आर्कियोप्टेरिक्स (Archaeopterve) कहते हैं। इसमें सरीसृपों (reptiles) तथा पक्षियों (aves) दोनों के लक्षण मिलते हैं।
घोड़े के विकास क्रम की सभी अवस्थाओं के जीवाश्म प्राप्त हो जाने से इसका विकास क्रम स्पष्ट हो चुका है। जीवाश्मों की उपस्थिति जैव विकास को स्पष्ट रूप से प्रमाणित करती है। जीवाश्म विज्ञान (palaeontology) की यह शाखा जीवों के विकास क्रम या जातिवृत्त का क्रमिक विवरण प्रस्तुत करती है। (II) संयोजी कड़ियों से प्रमाण (Evidences from connecting Links)
कुछ जीव-जातियों में अपने से निम्न तथा उच्च श्रेणी के जीवों के लक्षण मिलते हैं। ऐसी जीव-जातियाँ उन दोनों श्रेणियों के . मध्य सम्बन्ध स्थापित करती हैं। अतः इन्हें संयोजक जातियाँ या संयोजक कड़ियाँ (connecting links) कहते हैं।
संयोजक कड़ियों से जैव विकास प्रमाणित होता है। संयोजक कड़ियों के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं विषाणु (virus) जीवित तथा अजीवित के मध्य संयोजी कड़ी है। यूग्लीना (Euglena) पादप व जन्तु जगत के बीच की पादप कोशिकाओं की भाँति हरितलवक पाया जाता है। पेरीपैटस (Peripatus) आर्थोपोडा संघ का सदस्य है। इसमें आर्थोपोडा (arthropoda) व ऐनीलिडा (annelida) संघ के लक्षण मिलते हैं। इसमें आर्थोपोडा के समान खण्डयुक्त एवं नखरयुक्त टाँगें, ऐन्टीना (antenna) व श्वसन हेतु वायुनाल (trachea) पाए जाते हैं। संघ ऐनीलिडा की तरह सरल नेत्र तथा उत्सर्जन हेतु नेफ्रीडिया (nephridia) आदि पाए जाते हैं निओपिलीना (Neopilina) संघ ऐनीलिडा तथा मोलस्का के बीच की संयोजी कंड़ी है। इसका शरीर संघ ऐनीलिडा की भाँति खण्डित होता है तथा प्रत्येक खण्ड में तन्त्रिका गुच्छक (nerveganglion) तथा उत्सर्जी अंग पाए जाते हैं, किन्तु इसमें संघ मोलस्का की भाँति पाद, मेंटल तथा कवच भी पाए जाते हैं। लैटीमेरिया (Latimeria) मछलियों व उभयचरों के बीच की कड़ी है। लैटीमेरिया में उपस्थित मांसल पखनों (lobed fleshy fins) से उभयचरों के पादों का विकास हुआ है। जीवाश्म पक्षी र्कियोप्टेरिक्स(Archaeopteryx) में सरीसृप की भाँति लम्बी पूँछ, जबड़ों में दाँत व अधिक कशेरुक वाली लम्बी ग्रीवा थी, किन्तु पक्षियों की भाँति पंख व चोंच भी थी। ये समतापी थे। अतः आर्कियोप्टेरिक्स सरीसृप व पक्षी वर्ग के बीच की संयोजी कड़ी है।
प्रोटोथीरिया वर्ग के स्तनी, सरीसृप व स्तनियों के बीच की कड़ी हैं। प्रोटोथीरिया में स्तनियों की भाँति दुग्ध अन्थियाँ तथा बालं पाए जाते हैं, किन्तु मादा प्राणी सरीसृपों की तरह अण्डे देती है। इनमें कर्णपल्लव एवं स्तनों का अभाव होता है। क्लोएका छिद्र पाया जाता है। उदाहरण-ऑर्निथोरिन्कस (Ornithorhynchus),. टैकीग्लासस (Tachyglossus or Echidna)| (III) जन्तुओं व पादपों के भौगोलिक वितरण से प्रमाण (Evidences from Geographical Distribution of Animals and Plants)
पृथ्वी के अलग-अलग भागों व जलवायु में विभिन्न प्रकार के जन्तु व पादप पाए जाते भौगोलिक भाग कई स्थानों. पर भौगोलिक अवरोधों द्वारा एक-दूसरे से पृथक् होते हैं। विभिन्न वातावरण व जलवायु के अनुसार अलग भागों में अलग प्रकार, के जन्तु व पौधे विकसित हुए।
ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप में प्रोटोथीरिया तथा मेटाथीरिया स्तनी पाए जाते हैं। ये ऑस्ट्रेलिया के अतिरिक्त और कहीं नहीं नयों का विकास होने से पूर्व ही ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप एशिया से अलग हो गया था। अत: वहाँ यथीरिया स्तनी नहीं पहुँच पाए। एशिया महाद्वीप पर यूथीरिया स्तनियों का विकास होने के पश्चात् जीवन-संघर्ष में प्रोटोथोरिया व मेटाथीरिया समाप्त हो गए।
इस प्रकार प्रत्येक क्षेत्र के अपने विशिष्ट पौधे व जन्तु होते हैं। यह वितरण भी जैव विकास का प्रमाण प्रस्तुत करता है। (IV) अवशेषी अंगों से प्रमाण (V) समजात तथा समवृत्ति अंगों से प्रमाण (VI) भ्रौणिकी से प्रमाण (VII) शरीर-क्रिया विज्ञान एवं जीव-विज्ञान से प्रमाण
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