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BIOLOGY
विभिन्नताओं की परिभाषा लिखिए। विभिन्नता ...

विभिन्नताओं की परिभाषा लिखिए। विभिन्नता के विभिन्न प्रकारों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।

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विभिन्नताएँ
(Variations)
लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न समरूप जुड़वाँ (identical twins) को छोड़कर एक जाति के दो सदस्य एक जैसे नहीं होते। इनमें विभिन्नताएँ पायी जाती हैं। विभिन्नताएँ कायिक या जननिक होती हैं। कायिक विभिन्नताएँ वंशागत नहीं होतीं, जबकि जननिक विभिन्नताएँ वंशागत होती हैं। आनुवंशिक (जननिक) विभिन्नताएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशागत होकर नई जाति का विकास करती हैं। विभिन्नताएँ संरचनात्मक (structural), क्रियात्मक (physiological), मनोवैज्ञानिक (psychological) तथा । मानसिक (mental) होती हैं।
विभिन्नताओं के प्रकार
(Types of Variations) विभिन्नताओं को निम्नवर्णित तीन समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है (I) अविच्छिन्न एवं विच्छिन्न विभिन्नताएँ
(Continuous and Discontinuous Variations)
1. अविच्छिन्न विभिन्नताएँ (Continuous variations) ये छोटी व क्रमबद्ध (graded) विभिन्नताएँ होती हैं। लैमार्क तथा डार्विन ने अविच्छिन्न विभिन्नताओं को जैव विकास का आधार माना था। 2. विच्छिन्न विभिन्नताएँ (Discontinuous variations)-ये मूलदशा से भिन्न स्थिति को प्रदर्शित करती हैं। ह्यूगो डी वीज ने इन्हें उत्परिवर्तन (mutation) कहा। ये विभिन्नताएँ संख्यात्मक या गुणात्मक हो सकती हैं। संख्यात्मक विभिन्नता धनात्मक या ऋणात्मक हो सकती हैं। इसमें अंगों की संख्या अधिक या कम हो जाती है। गुणात्मक विच्छिन्न विभिन्नता में नए लक्षण प्रदर्शित होते हैं, जैसे-ऐनकन प्रजाति की भेड़, लम्बी पूंछ वाला मुर्गा, मधुमक्खी एवं दीमक में बहुरूपता का प्रदर्शन आदि। (II) निश्चयात्मक एवं अनिश्चयात्मक विभिन्नताएँ
(Determinate and Indeterminate Variations)
1. निश्चयात्मक विभिन्नताएँ (Determinate variations)-ये प्रभावी जीन संयोजन द्वारा नियन्त्रित होने के कारण निश्चित दिशा में विकसित होती रहती हैं। ये लाभदायक या हानिकारक हो सकती हैं।
2. अनिश्चयात्मक विभिन्नताएँ (Indeterminate variations)-ये आकस्मिक रूप से किसी भी अवस्था में प्रदर्शित हो जाती हैं। इनका कोई महत्त्व नहीं होता।
(III) उपार्जित एवं जननिक विभिन्नताएँ
(Acquired and Germinal Variations)
1. उपार्जित या कायिक विभिन्नताएँ (Acquired or Somatic variations)-वातावरणीय कारकों से प्रभावित उपार्जित या कायिक विभिन्नताएँ वंशागत नहीं होती।
2. जननिक विभिन्नताएँ (Germinal variations)-ये जनन कोशिकाओं के जीन ढाँचे (gene pattern) को प्रभावित करती हैं। ये विभिन्नताएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशागत होती रहती हैं।
विभिन्नताओं के कारण
(Causes of Variations)
विभिन्नताएँ वातावरणीय प्रभाव से, अंगों के उपयोग या अनुपयोग अथवा जीन ढाँचों में परिवर्तन के कारण उत्पन्न होती हैं।
(क) वातावरणीय प्रभाव (Environmental effect) से सामान्यतया कायिक विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं। वातावरणीय दशाएँ जैसे प्रकाश, ताप, भोजन, वायुदाब आदि जीवधारी के शरीर विकास पर सीधा प्रभाव डालते हैं।
वातावरणीय प्रभाव के कारण जीवधारी, अंगों का कम या अधिक उपयोग करते हैं, इसके फलस्वरूप अंगों का ह्रास या विकास होता है। लैमार्क ने वातावरणीय प्रभाव से उत्पन्न विभिन्नताओं को उपार्जित विभिन्नताएँ कहा था और इन्हें वंशागत माना था।
(ख) जीन ढाँचों में परिवर्तन (Change in gene pattern)- इसके कारण उत्पन्न विभिन्नताएँ वंशागत होती हैं। लिंगी जनन या उत्परिवर्तन के कारण जीन ढाँचे बदल जाते हैं।
1.लिंगी जनन के फलस्वरूप उत्पन्न विभिन्नताएँ निम्नलिखित कारणों से विकसित होती हैं
(i) द्वैत जनकता (dual parentage) के कारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी माता-पिता के गुणसूत्रों का सम्मिश्रण होता रहता है।
(ii) अर्द्धसूत्री विभाजन के समय समजात गुणसूत्रों का अनियमित बँटवारा एवं निषेचन के समय युग्मकों के स्वतन्त्र अपव्यूहन के कारण नए-नए जीन ढाँचे विकसित होते हैं।
(iii) अर्द्धसूत्री विभाजन के समय समजात गुणसूत्रों के क्रोमैटिड्स में विनिमय (crossing over) होता है। इसके फलस्वरूप जीन ढाँचे बदल जाते हैं।
2. उत्परिवर्तन (mutation) के फलस्वरूप विभिन्नताएँ निम्नलिखित कारणों से होती हैं ___(i) जीन उत्परिवर्तन (Gene mutation)—इसमें किसी लक्षण विशेष के जीन की रासायनिक संरचना या गुणसूत्र पर जीनं की स्थिति (locus) बदल जाती है।
(ii) गुणसूत्र उत्परिवर्तन (Chromosomal mutation)-अर्द्धसूत्री विभाजन के समय त्रुटियों जैसे स्थानान्तरण, उत्क्रमण, विलोपन, आवृत्ति आदि के कारण गुणसूत्र की जीन संरचना बदल जाती है।
(iii) गुणसूत्र समूह उत्परिवर्तन (Genomatic mutation)-इसमें गुणसूत्रों की संख्या बदल जाने से उत्परिवर्तन होते हैं। यह बहुगुणन (polyploidy) या विषमगुणन (aneuploidy) प्रकार का हो सकता है।
उपर्युक्त प्रकार के उत्परिवर्तन शरीर की आन्तरिक दशाओं के कारण या बाह्य कारणों से होते हैं। बाह्य कारणों से होने वाले उत्परिवर्तन प्राकृतिक अथवा कृत्रिम होते हैं।
जैव विकास में विभिन्नताओं का महत्त्व
(Significance of Variations in Organic Evolution) विभिन्नताएँ जैव विकास का आधार होती हैं। लाभदायक विभिन्नताएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशागत होती रहती हैं जिसके फलस्वरूप नई जाति का विकास होता है। हानिकारक विभिन्नताओं से युक्त जीवधारी जीवन में असफल होने के कारण नष्ट होते रहते हैं।
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