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प्रकृति में नयी जाति की उत्पत्ति कैसे हो...

प्रकृति में नयी जाति की उत्पत्ति कैसे होती है?

लिखित उत्तर

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प्रकृति में नई जातियों के निर्माण की प्रक्रिया को जातियों की उत्पत्ति या स्पीसिएशन (speciation) कहा जाता है।
नई जाति का निर्माण
(Formation of New Species) जाति (species) अन्तःप्रजनन करने वाले जीवों का एक समूह है जो एक या अनेक समष्टि में रहते हैं। एक जाति के सभी " सदस्यों का एक सम्मिलित जीन पूल (common gene pool) होता है। सभी नई जातियों का विकास पहले से उपस्थित जाति से होता है। एक जाति की विभिन्न समष्टियाँ भिन्न-भिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के लिए अनुकूलित हो जाती हैं। अनुकूलन के कारण मूल रूप में समान समष्टियाँ एक-दूसरे से भिन्न होने लगती हैं और समय के लम्बे अन्तराल के कारण एक समष्टि अपनी पूर्वज समष्टि से इनमें अन्तःप्रजनन (interbreeding) सम्भव नहीं रहता। इस प्रकार नई जाति बन जाती है। भिन्न भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इनके जीवन की दिशा, शारीरिक संरचना तथा कार्यिकी में भिन्नता आ जाती है। अत: पृथक्करण समष्टियों के जीन पूल में अन्तर स्थापित करके नई जाति के विकास के लिए आवश्यक है।
नई जातियों के बनने की निम्नलिखित दो विधियाँ हैं
1. विस्थानिक जाति उत्पत्ति (Allopatric speciation)-.यह भौगोलिक अवरोधों के कारण पृथक् एक ही जाति की विभिन्न समष्टियों से नई जाति के विकास की प्रक्रिया है। अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में रहने के कारण इनमें रचनात्मक भिन्नताएँ विकसित हो जाती हैं। यदि ये जातियाँ एक-दूसरे से पारस्परिक जनन करें तो जीन का आदान-प्रदान कर सकती हैं।
2. समस्थानिक जाति उत्पत्ति (Sympatric speciation)किसी जाति की समष्टि के कुछ सदस्यों में गुणसूत्र संख्या परिवर्तन (polyploidy) के कारण जननिक पृथक्करण स्थापित हो जाता है, इससे एक ही भौगोलिक क्षेत्र में दो या अधिक समष्टियाँ स्थापित होकर नई जातियाँ बनाती हैं। ये एक-साथ रहते हुए भी पारस्परिक जनन नहीं कर सकती जैसे अमेरिका के एक ही क्षेत्र में पाए जाने वाले राना पाइपेन्स (Rana pipens), राना सिल्वेटिका (Rana sylvatica) तथा राना केटिसब्याना(Rana catesbiana) प्रजाति के मेढकों में परस्पर जनन नहीं होता।
नई जाति के निर्माण में संकरण तथा बहुगुणिता की भूमिका (Role of Polyploidy and Hybridization in Formation of New Species) .. जन्तुओं में संकरण (hybridization) या बहुगुणिता (polyploidy) द्वारा नई जाति के निर्माण के बहुत कम उदाहरण हैं। कभी-कभी संकर जन्तुओं का निर्माण हो जाता है, जैसे-खच्चर आदि, किन्तु ये बन्ध्य (sterile) होते हैं। अत: नई जाति का निर्माण नहीं करते हैं।
पौधों में संकरण (hybridization) के पश्चात् कायिक प्रजनन (vegetative reproduction) द्वारा जाति आगे बढ़ाई जा सकती है। इसी बीच गुणसूत्रों की बहुगुणिता हो जाने से समजात गुणसूत्रों के फिर जोड़े बन जाते हैं तथा अब लैंगिक जनन भी हो सकता है। इस प्रकार नई जातियों का निर्माण हो जाता है। पौधों की लगभग एक-तिहाई जातियों का निर्माण संकरण व बहुगुणिता द्वारा ही हुआ है। गेहूँ की विभिन्न किस्में जंगली घास एजीलॉप्स स्पेल्टॉइड्स (Aegilops speltoides) तथा ए० स्क्वारिओसा (A. squariosa) से अलग-अलग संकरण व बहुगुणिता के कारण बनी हैं।
कपास की विभिन्न जातियाँ भी संकरण व बहुगुणिता के कारण बनी हैं। जंगली गुलाब व गुलाब की अन्य प्रजातियों में गुणसूत्रों की संख्या 14, 28, 42 तथा 56 हैं, जो स्पष्ट रूप से बहुगुणिता के कारण हैं।
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