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उत्परिवर्तन की परिभाषा दीजिए। उत्परिवर्त...

उत्परिवर्तन की परिभाषा दीजिए। उत्परिवर्तन सिद्धान्त किसने प्रतिपादित किया था?

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उत्परिवर्तनको
(Mutation)
गुणसूत्रों का निर्माण न्यूक्लियोप्रोटीन्स से होता है। न्यूक्लियोप्रोटीन्स न्यूक्लिक अम्ल (DNA एवं RNA) तथा प्रोटीन्स से. बने होते हैं। डी० एन० ए० अणुओं के रासायनिक संयोजन में होने वाले परिवर्तनों को उत्परिवर्तन (mutation) कहते हैं। उत्परिवर्तन के फलस्वरूप डी० एन० ए० अणुओं में न्यूक्लियोटाइड्स क्षारक जोड़ियों के अनुक्रम बदल जाते हैं। डी० एन० ए० अणुओं की संरचना में भिन्नता के कारण विभिन्नताएँ (variations) उत्पन्न होती हैं। उत्परिवर्तन सिद्धान्त ह्यूगो डीजीज (Hugo de Vries, 1901) ने प्रतिपादित किया था।
उत्परिवर्तन के फलस्वरूप विभिन्नताएँ निम्नलिखित कारणों से होती हैं
1. जीन उत्परिवर्तन (Gene mutation)—इसमें गुणसूत्र पर जीन की स्थिति (locus) बदल जाती है अथवा किसी लक्षण विशेष की जीन की रासायनिक संरचना बदल जाती है।
2. गुणसूत्र उत्परिवर्तन (Chromosomal mutation)-अर्द्धसूत्री विभाजन के समय होने वाली त्रुटियों जैसे . स्थानान्तरण, उत्क्रमण, विलोपन, आवृत्ति आदि के कारण गुणसूत्र की जीन संरचना बदल जाती है।
3. गुणसूत्र समूह उत्परिवर्तन (Genomatic mutation) गुणसूत्रों की संख्या बदल जाने से गुणसूत्र समूह उत्परिवर्तन होते हैं। विषम संख्या में परिवर्तन को विषमगुणन (aneuploidy) तथा सम संख्या में परिवर्तन को बहुगुणन (polyploidy) कहते हैं। जीवधारियों में उत्परिवर्तनों को वंशागति के आधार पर दो समूह में बाँट लेते हैं
(i) दैहिक उत्परिवर्तन (Somatic mutation)-बहुकोशीय जीवों में जैविक क्रियाएँ दैहिक कोशिकाओं द्वारा होती हैं। कभी-कभी हानिकारक पदार्थों, विकिरण अथवा विषाणु संक्रमण के फलस्वरूप दैहिक कोशिकाओं का डी० एन० ए० प्रभावित हो
ये विभिन्नताएँ वंशागत नहीं होती। दैहिक उत्परिवर्तनों के कारण दृश्य रूप लक्षण बदल जाते हैं।
(ii) जननिक उत्परिवर्तन (Germinal mutation)-जनन कोशिकाएँ (germ cells) सन्तानोत्पत्ति से सम्बन्धित होती हैं। जनन कोशिकाओं में नर या मादा युग्मक बनते हैं। युग्मकों के संलयन से युग्मनज (zygote) बनता है। युग्मनज से भ्रूणीय विकास द्वारा संतति का विकास होता है। जननिक कोशिकाओं में होने वाले उत्परिवर्तनों को, जननिक उत्परिवर्तन कहते हैं। इसके फलस्वरूप उत्पन्न विभिन्नताएँ वंशागत होती हैं। संतति सदस्यों, जिनमें उत्परिवर्तन प्रदर्शित होते हैं, उन्हें उत्परिवर्ती (mutants) कहते हैं।
उपर्युक्त प्रकार के उत्परिवर्तन शरीर की आन्तरिक दशाओं या बाह्य कारणों से होते हैं। इसके आधार पर उत्परिवर्तनों को दो समूहों में बाँट लेते हैं
(i) स्वजात उत्परिवर्तन (Autogenous mutation)-ये जीवधारी के शरीर में होने वाली प्रक्रियाओं की अनियमितताओं के कारण होते हैं। ये त्रुटियाँ सामान्यतया लिंगी जनन के समय युग्मक निर्माण या निषेचन के समय होती हैं। हॉर्मोन्स या हानिकारक पदार्थों के कारण भी स्वजात उत्परिवर्तन हो जाते हैं।
(ii) प्रेरित उत्परिवर्तन (Induced mutation)—ये बाह्य कारकों के कारण होते हैं। इन्हें बहिर्जात उत्परिवर्तन (exogenous mutation) भी कहते हैं। ये रेडियोधर्मी पदार्थ, पराबैंगनी किरणों, कॉस्मिक किरणों, गामा किरणों आदि के कारण उत्पन्न होते हैं। इसके अतिरिक्त कैफीन, मॉर्फीन, कैम्फर आदि रासायनिक पदार्थों तथा उच्च ताप आदि से भी उत्परिवर्तन हो जाते हैं। इन पदार्थों को उत्परिवर्तक (mutagens) कहते हैं। प्रेरित उत्परिवर्तन का अध्ययन सर्वप्रथम एच० जे० मुलर (H.J. Muller 1926-27) ने ड्रोसोफिला (Drosophila) पर किया था। द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा-नागासाकी नगरों पर जो परमाणु बम गिराए, उनके विकिरण के प्रभाव से वहाँ के निवासियों के जीन ढाँचों में हुए परिवर्तनों के कारण अब भी वहाँ विकलांग सन्तानें उत्पन्न हो रही हैं।
जैव विकास में उत्परिवर्तन का महत्व (Importance of mutation in evolution)---जीवधारियों में वातावरणीय प्रभाव तथा जीन ढाँचों में परिवर्तन होने अर्थात् उत्परिवर्तन के फलस्वरूप विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं। विभिन्नताएँ जैव विकास का आधार होती हैं। उत्परिवर्तन शरीर की आन्तरिक दशाओं के कारण (दैहिक उत्परिवर्तन) या बाह्य कारणों (प्रेरित उत्परिवर्तन) से होते हैं। विभिन्नताएँ लाभदायक, हानिकारक या निरर्थक होती हैं। लाभदायक विभिन्नताओं की पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशागति होती रहती है। हानिकारक एवं निरर्थक विभिन्नताएँ जीवन की किसी-न-किसी अवस्था में नष्टं होती रहती हैं। उत्परिवर्तक (mutant) शुद्ध नस्ली होते हैं। ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशागत होकर नई प्रजाति का विकास करते हैं। उत्परिवर्तन के फलस्वरूप एक पूर्वज जाति से एक साथ मिलती-जुलती अनेक जातियाँ विकसित हो सकती हैं।
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