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डार्विन के अनुसार जैव विकास केसे हुआ? जेव विकास का आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धान्त क्या है? विवेचना कीजिए ।

लिखित उत्तर

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जैव विकास (Evolution) आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धान्त
(Modern Synthetic Theory of Evolution) आधुनिक संश्लेषणात्मक मत में उत्परिवर्तन तथा प्राकृतिक चयन को जैव विकास के सम्बन्ध में एक तथ्य के रूप में माना गया है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने समष्टि आनुवंशिकी की धारणा विकसित की जिसमें मेण्डल के नियमों और समष्टि विधा (population dynamics) को आधार माना गया है। समष्टि को जैव विकास की इकाई माना जाता है।
आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धान्त वास्तव में नव-डार्विनवाद का ही एक रूप है। डॉब्जेन्स्की (Dobzhansky, 1937) ने अपनी पुस्तक "आनुवंशिकी तथा जातियों की उत्पत्ति" (Genetics and the origin of species) में इस सिद्धान्त का वर्णन किया है। जूलियन हक्सले (Julian Huxley, 1942), हैल्डेन (Haldane), अर्नेस्ट मायर (Ernst Mayr, 1970), स्टेबिन्स (Stebbins, 1976) ने इसका समर्थन किया।
आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धान्त के अनुसार जैव विकास निम्नलिखित कारकों से प्रभावित होता है
1. मूल कारक (Basic factors)-(i) जीन उत्परिवर्तन, (ii) गुणसूत्रों की रचना तथा संख्या में परिवर्तन, (iii) जीन पुनर्मिश्रण, (iv) प्राकृतिक वरण तथा (v) जननिक पृथक्करण जैव-विकास के मूल कारक हैं।
प्रथम तीन कारकों से विभिन्नताएँ (variations) उत्पन्न होती हैं। इनके फलस्वरूप जीन नमूनों (gene patterns) की संख्या में वृद्धि होती है। एक जाति के सभी सदस्यों में पाए जाने वाले सभी जीन्स मिलकर जीन राशि (gene pool) बनाते हैं। प्राकृतिक वरण तथा जननिक पृथक्करण जैव विकास को एक निश्चित दिशा प्रदान करते हैं।
2. सहायक कारक (Accessory factors)-जीन राशि (gene pool) को बढ़ाने में निम्न कारक सहायक होते हैं
(i) प्रवास (Migration)-एक समष्टि का दूसरी समष्टि में चले जाना। अन्तर्जातीय प्रजनन के फलस्वरूप जननक्षम संकर सन्तानें पैदा होने से एक जाति के जीन्स दूसरी जाति में पहुँचा दिए जाते हैं।
(ii) प्रसंस्करण (Hybridization)-सम्बन्धित जातियों, प्रजातियों में प्रजनन को प्रसंस्करण या संकरण कहते हैं।
(iii) आनुवंशिक अपवहन (Genetic drift)-महामारी आदि के कारण किसी जाति विशेष की आबादी बहुत कम हो जाने से जीन राशि बहुत घट जाती है। नई पीढ़ी के सदस्यों में प्रजाति के सभी मूल लक्षण उपलब्ध नहीं होते। अत: नई पीढ़ी में अपनी ही जाति के मूल लक्षण उपलब्ध नहीं होते अर्थात् नई पीढ़ी मूल पीढ़ी से भिन्न होती है। इसे आनुवंशिक अपवहन कहते हैं।
आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धान्त में जीनी पुनर्योजन (genetic recombination) एक महत्त्वपूर्ण कारक है। जीन समूह से अनुकूलन के फलस्वरूप, प्राकृतिक वरण द्वारा नई जातियों की उत्पत्ति होती है।
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