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BIOLOGY
विभिन्न प्रकार के गुणसूत्र का वर्णन कीजि...

विभिन्न प्रकार के गुणसूत्र का वर्णन कीजिए।

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अनुकूलन (Adaptation)--वातावरण के. अनुरूप जीवधारियों के शरीर में संरचनात्मक तथा क्रियात्मक (physiological) परिवर्तनों का होना जिससे जीवधारी अधिक सफलतापूर्वक जीवनयापन कर सकें, अनुकूलन कहलाता है। जीवधारियों में मुख्यत: भोजन तथा सुरक्षा की दृष्टि से अनुकूलन होते हैं। किसी जीव की जीनी संरचना किसी विशेष पर्यावरण के लिए अनुकूलित होती है जैसे जल में तैरने के लिए मछलियों में पखने (fins), वायवीय जीवों में पंख (swings), शत्रुओं से सुरक्षा हेतु अनुहरण (mimicry) व सींग आदि अनुकूली लक्षण हैं। अनुकूलन को दो समूह में बाँट सकते हैं (क) संश्च अनुकूलन (Post adaptation)-एक जाति जिस वातावरण में पहले से रह रही है उसके लिए अनुकूलित होना, इससे जाति में अधिक श्रेष्ठता (perfection) आ जाती है। इसे यश्च अनुकूलन कहते हैं। (ख)अग्र अनुकूलन (Pre adaptation)---कुछ परिस्थितियों में जीव-जातियाँ एक वातावरण में रहते हुए ही दूसरे वातावरण के लिए अनुकूलन कर लेती हैं और इसके पश्चात् उस वातावरण में ती हैं। इसे अग्र.या भविष्यात्मक (prospective adaptation) कहते हैं। अनुकूलन का आनुवंशिक आधार-विकासीय अनुकूलन का आनुवंशिक आधार होना चाहिए अन्यथा अनुकूलन का जैव कास में कोई महत्व नहीं होता। जे० लेडरबर्ग (J. Lederberg) तथा ई० लेंडरबर्ग (E. Lederberg, 1952) ने रेप्लीका प्लेट (Replica plate) प्रयोग द्वारा आनुवंशिक आधार को जीवाणुओं में प्रदर्शित किया। लेडरबर्ग ने एगार प्लेट पर जीवाणु कोशिकाओं का संवर्धन डाला। इससे एगार प्लेट पर अनेक जीवाणु निवह (colony) उग आए। प्रत्येक निवह की सभी कोशिकाएँ समान जीनी संरचना, वाली थीं। इस बहुनिवह वाली एगार प्लेट को मास्टर प्लेट (master plate) कहते हैं। मास्टर प्लेट पर एक सूक्ष्मजीवी रहित (sterile) मखमल का कपड़ा रखकर हल्के से दबा दिया, इससे इस पर प्रत्येक निवह ... से कुछ जीवाणु चिपक गए और इस पर निवह बन गए। मखमल के कपड़े को नयी एगार प्लेट पर दबाने से मास्टर प्लेट की रेप्लीका (replica) प्लेटें बन गईं। इसके पश्चात् उन एगार प्लेटों पर रेप्लीका बनाने का प्रयास किया गया जिनके एगार में पेनिसिलिन प्रतिरक्षी (antibiotic) था। अधिकांश जीवाणु पेनिसिलिन वाली एगार प्लेट पर वृद्धि नहीं करते और उनके निवह नहीं बनते। कुछ जीवाणु निवह बनाने में सफल रहते हैं, इससे स्पष्ट होता है कि जिन जीवाणुओं के निवह पेनिसिलिन वाली एगार प्लेट पर बने, वें पेनिसिलिन प्रतिरोधी (resistant).थे। इनमें पेनिसिलिन प्रतिरोधी उत्परिवर्ती जीन था। इससे स्पष्ट है कि उत्परिवर्तित ।। जीवाणु अधिक अनुकूली थे। अनुकूली विकिरण (Adaptive Radiations)—किसी एक पूर्वज जाति से विभिन्न जातियों के विकास को अपसारी अनुकूलन (divergent adaptations) कहते हैं। इसके फलस्वरूप विकसित प्रत्येक नई जाति स्वयं को अपने वातावरण के अनुकूल बना लेती है। विकासीय अपसरण या अपसारी अनुकूलन के कारण पूर्व जाति से अनेक जातियाँ विकसित हो जाती हैं। इन जातियों में जीवित रहने और जीवन-संघर्ष से बचने के लिए नए आवासों की ओर प्रवसन करने की प्रवृत्ति होती है। विभिन्न आवासों में पहुंचकर ये स्वयं को उस आवास के अनुकूल रूपान्तरित कर लेते हैं, इसे अनुकूली विकिरण या अपसारी विकास कहते हैं। आधुनिक स्तनियों की पूर्वज-परम्पराओं के अध्ययन से ज्ञात होता है कि सभी स्तनियों का विकास एक जैसे मूल पूर्वज से हुआ है जो कीटभक्षी, पंचांगलिपाद तथा छोटे पादों वाले प्राणी थे। इनसे विकसित कुछ स्तनी निम्न प्रकार के हैं (i) प्राइमेट्स आदि वृक्षवासी प्राणी। (ii) उड़ने की क्षमता वाले वायवीय स्तनी (चमगादड़)। (iii) तेजी से दौड़ने की क्षमता वाले धावी प्राणी, जैसे—हिरन, घोड़ा आदि। (iv) जलीय स्तनी, जैसे—व्हेल, डॉलफिन आदि।।" उपर्युक्त स्तनी प्राणियों में पर्यावरण के अनुकूल पादों का रूपान्तरण हुआ। जब एक से अधिक अनुकूली विकिरण अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्र में भिन्न आवासों का प्रतिनिधित्व करते हुए प्रकट होते हैं तो इसे अभिसारी विकास (convergent evolution) कहते हैं, जैसे-ऑस्ट्रेलियन मार्सेपियल और प्लासैन्टल स्तनी। डार्विन ने गैलापैगोस द्वीप (Galapagos island) की विभिन्न परिस्थितियों तथा वातावरण के परिवर्तन के कारण वहाँ भिन्न-भिन्न प्रकार की 20 फिंच पक्षी (Darwins Finches) देखीं। ये पक्षी मूलरूप से बीजभक्षी थे और दक्षिणी अमेरिका के विकास |269 निवासी थे। इनके कुछ संदस्य गैलापैगोस द्वीपों में रहने लगे। परिस्थितियों के अनुरूप इनके स्वरूपों व स्वभाव में अनेक बदलाव आए जिससे ये अपने वातावरण से अनुकूलित हो गए। इनकी चोंच शाकाहारी, कीटभक्षी तथा अन्य प्रकार के भोजन को ग्रहण करने के लिए परिवर्तित हो गयी। डार्विन की फिंचे अनुकूली विकिरण का उपयुक्त उदाहरण है।
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