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वाष्पोत्सर्जन से आप क्या समझते हैं? इससे...

वाष्पोत्सर्जन से आप क्या समझते हैं? इससे पौधों को क्या लाभ हैं? इस प्रयोग द्वारा स्पष्ट कीजिये।

लिखित उत्तर

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वाष्पोत्सर्जन (Transpiration)
जितना जल पौधे अपनी जड़ों द्वारा अवशोषित करते हैं, उसका लगभग 1% जल पौधे की उपापचय क्रियाओं में प्रयुक्त होता है। शेष जल पौधे के वायवीय भागों से वाष्प बनकर विसरित होता रहता है। इस क्रिया को वाष्पोत्सर्जन (transpiration) कहते हैं। वाष्पोत्सर्जन हर समय होता है, किन्तु इसकी दर सदैव एक-जैसी नहीं रहती है। दिन में वाष्पोत्सर्जन की दर अधिक तथा रात्रि में कम होती है।
परिभाषा (Definition)
"वह क्रिया जिसके अन्तर्गत पौधे के वायवीय भाग आवश्यकता से अधिक जल को वाष्प के रूप में बाहर निकालते हैं, वाष्पोत्सर्जन (transpiration) कहलाती है।"
पौधे से होने वाली वाष्पोत्सर्जन क्रिया का प्रदर्शन (Demonstration of Transpiration by Plant)
एक गमले में लगे स्वस्थ पौधे को जिसमें काफी पत्तियाँ हों, अच्छी तरह सींचे लेते हैं। इसकी मिट्टी व गमले को रबड़ या पॉलिथीन की चादर से पूरी तरह ढक देते हैं। इस गमले को काँच की एक प्लेट पर रखकर एक बेलजार से ढक देते हैं। बेलजार के आधार पर (शीशे की प्लेट के साथ) ग्रीस लगाकर उपकरण को वायुरुद्ध (air tight) कर देते है।

नियन्त्रक-उपकरण-प्रयोग को स्पष्ट करने के लिए एक और उपकरण बिना पौधे के गमले से उपर्युक्त के अनुसार बनाया जाता है। इसे नियन्त्रक-उपकरण कहते हैं।
उपकरणों को कुछ समय के लिए खुले स्थान पर रख दिया जाता है। प्रथम उपकरण में बेलजार की भीतरी सतह पर जल की बूँदें एकत्र हो जाती हैं। नियन्त्रक-उपकरण में जल की बूँदें एकत्र नहीं होती हैं।
उपर्युक्त प्रयोग से सिद्ध होता है कि पौधे के वायवीय अंगों से जलवाष्य निकलती हैं अर्थात् वाष्पोत्सर्जन होता है।
वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले वातावरणीय कारक (Environmental Factors affecting Transpiration)
वाष्पोत्सर्जन की दर एक अवस्था से दूसरी अवस्था में तथा एक पौधे से दूसरे पौधे में सदैव बदलती रहती है। यह दर अनेक कारकों से प्रभावित होती है। कारकों को दो समूहों में बाँट लेते हैं -
(क) वातावरणीय कारक, (ख) आन्तरिक कारक।
(क) वातावरणीय कारक (Environmental Factors)-ये वाष्पोत्सर्जन पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभाव डालते हैं। ये प्रमुखत: निम्नलिखित हैं -
1. वायु की आर्द्रता (Humidity of Air) -वायु की आर्द्रता वाष्पोत्सर्जन की दर को प्रभावित करती है। वायु की आर्द्रता बढ़ने से वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है और आर्द्रता घटने से वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है।
वायु गति (Wind Velocity) - स्थिर वायु में पौधे के समीपवर्ती वातावरण में वायु की आर्द्रता बढ़ जाती है। अत: वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है। वायु गति के कारण, पौधे के समीपवर्ती क्षेत्र में वायु की आर्द्रता कम बनी रहती है, इससे वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। इस प्रकार वायु की गति जितनी अधिक होगी वाष्योत्सर्जन की दर भी अधिक होगी, लेकिन अधिक तेज हवा चलने पर पंर्णरन्ध बन्द हो जाते हैं और वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।
3. तापमान (Temperature)-ताप का सीधा प्रभाव वायु की आर्द्रता पर पड़ता है। तापमान अधिक होने पर वायु की जलवाष्प धारण करने की क्षमता में वृद्धि हो जाती है अर्थात् वायु की आर्द्रता अधिक तापमान पर कम हो जाती है, अतः तापमान के बढ़ने से वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है और तापमान के कम होने पर वाष्पोत्सर्जन दर कम होती जाती है।
4. वायु का दाब (Atmospheric Pressure)-वायु का दाब कम होने पर वायु की जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता बढ़ जाती है (आर्द्रता कम हो जाने के कारण), अतः वाष्पोत्सर्जन की दर ऐसी अवस्था में बढ़ जाती है। इसके विपरीत दशा में जब वायुमण्डलीय दाब अधिक हो तो जलवाष्प धारिता कम हो जाने के कारण वाष्पोत्सर्जन पर उल्टा प्रभाव पड़ेगा अर्थात् वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है। ।
5. प्रकाश की तीव्रता- (Light Intensity)-साधारणत: रात्रि में स्टोमेटा (रन्ध्र) बन्द रहते हैं, अत: रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन रात्रि में नहीं होता है। प्रकाश में स्टोमेटा खुल जाते हैं, अत: वाष्पोत्सर्जन की दर प्रकाश तीव्रता के साथ-साथ बढ़ती जाती है। प्रकाश की तीव्रता बढ़ने से तापमान बढ़ता है, वायु की आर्द्रता कम हो जाती है, अत: वाष्पोर्क्सजन की दर बढ़ जाती है। प्रकाश की तीव्रता के कम होने पर वातावरण का तापमान कम हो जाता है, वायु की आर्द्रता बढ़ जाती है, वाष्पोजिन की दर कम हो जाती है।
6. उपलब्ध मृदा जल (Available Soil Water)-भूमि में उपलब्ध जल की मात्रा कम होने से जड़ों द्वारा अवशोषण भी कम होता है, अत: वाष्पोत्सर्जन की दर भी कम हो जाती है। यदि प्राप्य जल की मात्रा बढ़ जाती है तो अवशोषण बढ़ने से वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। इस प्रकार जल के अवशोषण को प्रभावित करने वाले सभी कारक वाष्पोत्सर्जन को भी प्रभावित करते हैं।
(ख)आन्तरिक कारक (Internal Factors) - पत्तियों की संरचना, रन्ध्रों की संख्या एवं संरचना आदि वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करती है।
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