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BIOLOGY
शरीर के लिए वसा क्यों आवश्यक है?...

शरीर के लिए वसा क्यों आवश्यक है?

लिखित उत्तर

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भोजन की शरीर के लिए आवश्यकता अथवा इसके कार्य (Necessity of Food for a Body or its Functions)
भोजन जीवधारियों के लिए आवश्यक है। इसके निम्नलिखित कार्य हैं
1. ऊर्जा की आपूर्ति (Supply of Energy)-जैविक कार्यों के लिए आवश्यक ऊर्जा भोजन के जैव-रासायनिक ऑक्सीकरण से प्राप्त होती है। सामान्यतया ऊर्जा उत्पादन हेतु कार्बोहाइड्रेट्स (ग्लूकोस) का उपयोग होता है। कार्बोहाइड्रेट्स. से मुक्त रासायनिक ऊर्जा ATP में गतिज ऊर्जा (Trinetic energy) के रूप में संचित हो जाती है। ATP से जैविक कार्यों के लिए ऊर्जा प्राप्त होती है। वसा से कार्बोहाइड्रेट्स की तुलना में अधिक ऊर्जा (लगभग 2.5 गुना) मुक्त होती है।
2. शरीर में टूट-फूट की मरम्मत.(Repair of the Losses in the Body)-भोजन के प्रोटीन, खनिज लवण, विटामिन्स आदि शरीर में प्रतिदिन होने वाली टूट-फूट की मरम्मत करते रहते हैं। विटामिन्स तथा खनिज लवण मरम्मत की क्रियाओं को समन्वित तथा प्रेरित करते हैं।
3. शरीर की वृद्धि (Growth of the Body)-पचे हुए पोषक तत्त्वों को जीवद्रव्य द्वारा आत्मसात कर लेने को स्वांगीकरण (assimilation) कहते हैं। इसके फलस्वरूप जीवधारियों द्व (growth) होती है। शरीर वृद्धि में प्रोटीन्स, खनिज लवण, विटामिन्स आदि महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
4. रोगों से रक्षा (Protection from Diseases सन्तुलित भोजन स्वास्थ्यवर्द्धक होता है। यह शरीर की प्रतिरोधक शक्ति (immunity) को बढ़ाता है। भोजन के अवयव जैसे प्रोटीन्स, खनिज लवण, विटामिन्स आदि इस कार्य के लिए महत्त्वपूर्ण पोषक तत्त्व हैं।
5. आनुवंशिक लक्षणों की वंशागति (Inheritance of hereditary characters)-न्यूक्लिक अम्ल (DNA) आनुवंशिक लक्षणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुँचातें हैं।
भोजन के मुख्य तत्त्व (Main Elements of Food) भोजन में काबोहाइड्रेट्स, वसाएँ, प्रोटीन, खनिज लवण, विटामिन्स, जल आदि प्रमुख पोषक तत्त्व हैं, जो शरीर के लिए ऊर्जा उत्पादन, शरीर निर्माण एवं मरम्मत तथा रोगों के प्रति प्रतिरोध क्षमता उत्पन्न करते हैं। पोषक तत्त्वों को कार्यों के आधार पर निम्नलिखित समूहों में बाँटते हैं
1. ऊर्जा प्रदान करने वाले तत्त्व (Energy Producing Elements)--प्रमुखतः कार्बोहाइड्रेट्स तथा वसाएँ, जैसे अनाज, घी, तेल, शक्कर आदि।
2. शरीर निर्माणकारी तत्त्व (Body building Elements)-कोशिकाओं की टूट-फूट की मरम्मत तथा जीवद्रव्य निर्माण करने वाले तत्त्व। इनमें प्रोटीन्स, वसाएँ तथा जल प्रमुख हैं, जैसे—मांस, मछली, अण्डे, दाल, तिलहन आदि।
3. प्रतिरक्षा प्रदान करने वाले तत्त्व (Immunity Providing Elements) रोगों के प्रति प्रतिरोधक शक्ति विकसित , करने वाले तत्त्व, विभिन्न जैविक क्रियाओं के भली-भाँति संचालन में भी सहायता करते हैं, जैसे-विटामिन्स, खनिज लवण आदि।
4. आनुवंशिक तत्त्व (Heriditary elements)-डी०एन०ए० तथा आर०एन०ए० आनुवंशिक लक्षणों की वंशागति के लिए उत्तरदायी होते हैं।
भोजन के अवयव-रासायनिक वर्गीकरण (Elements of Food : Chemical Classification)
भोजन को रासायनिक संरचना के आधार पर अग्रांकित प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है-

I. कार्बनिक भोज्य पदार्थ (Organic Food Material)
(i) कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates)—इनका निर्माण कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन से होता है। सरल : . कार्बोहाइड्रेट्स के रूप में शर्कराएँ. लूकोस, फ्रक्टोंस, लैक्टोस, सुक्रोस आदि प्रमुख हैं। ये गन्ना, चुकन्दर, खजूर, अंगूर आदि । . में काफी मात्रा में मिलते हैं। जटिल कार्बोहाइड्रेट्स के रूप में मण्ड व ग्लाइकोजन प्रमुख खाद्य पदार्थ हैं, जो आलू, चावल, अरवी, मक्का, साबूदाना आदि में पर्याप्त मात्रा में होता है।
कार्बोहाइड्रेट्स की उपयोगिता (Utility of Carbohydrates)-(i) मोनोसैकेसइड्स जैविक कार्यों के लिए ऊर्जा प्रदान करते हैं। ग्लूकोस को कोशिकीय ईंधन (cellular fuel) कहते हैं। (ii) पेन्टोस शर्करा DNA तथा RNA के निर्माण में भाग लेती है। (ii) ग्लाइकोजन (पॉलिसैकेराइड) संचित भोजन के रूप में पेशियों तथा यकृत में पाया जाता है। (iv) आवश्यकता से अधिक कार्बोहाइड्रेट्स वसीय ऊतक (adipose tissue) के रूप में बदल कर संचित होते हैं।
(ii) वसाएँ (Fats)-वसाओं का निर्माण कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन से होता है। इनमें ऑक्सीजन की मात्रा अपेक्षाकृत बहुत कम होती है। वसा, मांसाहारी तथा शाकाहारी दोनों प्रकार के भोजन से प्राप्त होती है। पशुओं से यह मक्खन, पनीर, दूध तथा घी के रूप में प्राप्त होती है, जबकि वानस्पतिक भोजन में यह नारियल, बादाम, मूंगफली, सरसों आदि तिलहनों से तेलों के रूप में प्राप्त किए जा सकते हैं। जन्तु वसाएँ संतृप्त (saturated) तथा वनस्पति वसाएँ मुख्यतः असंतृप्त (unsaturated) होती हैं। वसा या लिपिड्स का निर्माण वसीय अम्ल तथा ग्लिसरॉल से होता है।
वसा की उपयोगिता (Utility of Fats)-(1),शरीर में भोज्य पदार्थ वसा के रूप में संगृहीत होते हैं। (2) वसा से कार्बोहाइड्रेट्स की तुलना में लगभग 2.5 गुना अधिक ऊर्जा प्राप्त होती है। (3) वसा शरीर ताप नियमन में सहायक होती है। (4) शरीर को सुडौल बनाती है। संयुक्त लिपिड्स कोशिका कला तथा कोशिकांगों (cell organelles) की संरचना में भाग . लेती है।
(iii) प्रोटीन्स (Proteins)-ये जटिल कार्बनिक पदार्थ हैं। इनका निर्माण कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन से होता है। ऐमीनो अम्लों (amino acids) से प्रोटीन का निर्माण होता है। ऐमीनो, अम्ल परस्पर पेप्टाइड बन्ध (peptide bonds) द्वारा जुड़े रहते हैं। जीवधारियों में 20 ऐमीनो अम्ल विभिन्न प्रोटीन्स का निर्माण करते हैं। जन्तु कोशिकाएँ 10 ऐमीनो अम्लों का । संश्लेषण करने में सक्षम होती हैं। अत: इनको अनावश्यक ऐमीनो अम्ल कहते हैं। शेष 10 ऐमीनो अम्ल हमें पौधों से प्राप्त होते हैं। इनको आवश्यक ऐमीनो अम्ल कहते हैं। जन्तु प्रोटीन-मांस, मछली, दूध, अण्डा, पनीर आदि से प्राप्त होती है तथा वनस्पति प्रोटीन प्रमुखत: दालों (pulses), गेहूँ, मूंगफली, बादाम तथा अन्य सूखे मेवों आदि से प्राप्त होती है।
प्रोटीन्स की उपयोगिता (Utility of Proteins)-(i) प्रोटीन का प्रमुख कार्य टूट-फूट की मरम्मत करना है। यह जीवद्रव्य का निर्माण करने वाला प्रमुख पदार्थ है। (ii) विभिन्न प्रकार के एन्जाइम्स (enzymes) भी प्रोटीन होते हैं। एन्जाइम्स उपापचयी क्रियाओं में उत्प्रेरक का कार्य करते हैं। (iii) आवश्यकता पड़ने पर इनके ऑक्सीकरण से ऊर्जा (energy) प्राप्त होती है। (iv) प्रोटीन्स प्रतिरक्षी (antibodies) बनाकर शरीर की सुरक्षा करती हैं। (v) ये न्यूक्लियोप्रोटीन्स के निर्माण में भाग लेती हैं। (vi) रक्त की फाइब्रिनोजनं तथा थॉम्बिन प्रोटीन्स रक्त का थक्का (blood clot) बनाकर रक्त स्राव को रोकती हैं। (ii) हीमोग्लोबिन शरीर में `O_(2)`, परिवहन का कार्य करती है।
(iv) विटामिन्स (Vitamins).-यें जटिल कार्बनिक पदार्थ हैं। ये शरीर की उपापचय क्रियाओं के लिए आवश्यक होते हैं। इन्हें वृद्धिकारक (growth factors) भी कहते हैं, इनकी कमी से अपूर्णता रोग (deficieney disease) हो जाते हैं। इनकी खोज सर्वप्रथम एन० आई० लूनिन (N.I. Lumin, 1881) ने की थी। विटामिन मत हॉकिन्स एवं कुंक (Hopkins &Funk, 1912) ने प्रस्तुत किया था. ये प्रमुखतः दो प्रकार के होते हैं-
(क)जल में घुलनशील विटामिन्स जैसे विटामिन .बी., .सी. आदि।
(ख) वसा में घुलनशील विटामिन्स, जैसे-विटामिन .ए., .डी.,.ई.,.के. आदि।
विटामिन्स विभिन्न भोज्य पदार्थों में मिलते हैं, जैसे-बी-कॉम्प्लेक्स अण्डा, दूध, फल, मांस, हरी सब्जियाँ, यकृत आदि में, विटामिन .सी. सन्तरा, नींबू, टमाटर, आँवला, मौसमी आदि में विटामिन .ए. दूध, अण्डा, मछली के तेल, हरी सब्जियों आदि में, विटामिन .डी. सूर्य के प्रकाश से त्वचा में बन जाता है तथा मछली, दूध, अण्डा, घी आदि में विटामिन .ई. मांस, अण्डा, हरी सब्जियों, गेहूँ आदि में तथा विटामिन .के. पत्ते वाली सब्जियों, पनीर, अण्डा आदि में पाया जाता है।
विटामिन्स की उपयोगिता (Utility of Vitamins) विटामिन्स शरीर की विभिन्न उपापचयी क्रियाओं के संचालन में सहायक होते हैं। इनकी कमी से अपूर्णता रोग हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, विटामिन .ए. की कमी से रतौंधी, जीरोफ्थैल्मिया (xerophthalmia), त्वचा सूखना, वृक्कों में पथरी (kidney stone) आदि, .बी. समूह के विटामिनों की कमी से बेरी-बेरी रोग, होंठों का फटना, त्वचा पर दाने निकलना, नेत्रों का कमजोर होना, पाचन तथा तन्त्रिका तन्त्रं की क्रियाशीलता में कमी, दुर्बलता आदि, विटामिन .सी. की कमी से स्कर्वी, मसूड़ों का सूजना आदि तथा विटामिन .डी. की कमी से रिकेट्स (सूखा रोग) आदि रोग हो जाते हैं।
(v) न्यूक्लिक अम्ल (Nucleic Acid)-इनकी खोज फ्रेड्रिक मीश्चर (Friedrick Meischer, 1869) ने की थी। न्यूक्लिक अम्ल नाम आल्टमैन (Altmann, 1889) ने दिया। इनका निर्माण न्यूक्लियोटाइड्स के बहुलीकरण से होता है। प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड तीन अणुओं से बना होता है-(a) पेन्टोस शर्करा-राइबोस या डिऑक्सीराइबोस,(b) नाइट्रोजनी क्षारक एडीनीन, ग्वानीन, थायमीन/यूरेसिल या साइटोसीन तथा (c) फॉस्फेट समूह का यौगिक। .
न्यूक्लिक अम्ल दो प्रकार के होते हैं—(क) डिऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल (DNA) तथा (ख) राइबोन्यूक्लिक अम्ल (RNA)
कार्य-डिऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल (DNA) आनुवंशिक (genetic) होता है। यह लक्षणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुंचाता है। RNA का संश्लेषण करता है। राइबोन्यूक्लिक अम्ल (RNA) प्रोटीन संश्लेषण द्वारा लक्षणों का निर्धारण करता है। II. अकार्बनिक भोज्य पदार्थ (Inorganic Food Material)
(i) खनिज लवण (Mineral Salts)--अकार्बनिक खनिज तत्त्व शरीर की विभिन्न जैविक क्रियाओं को सुचारु रूप से . चलाने के लिए आवश्यक होते हैं। लवण दूध, पनीर, अण्डा, मछली, फल, हरे पत्ते वाली सब्जियों, अनाज आदि में पाए जाते हैं। आवश्यकता के आधार पर इनको दो समूहों में बाँट लेते हैं-
(क) वृहत् पोषक तत्त्व (Macro nutrients)—इनकी अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है। जैसे--कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, सोडियम, पोटैशियम, कैल्सियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, सल्फर आदि।
(ख)सूक्ष्म पोषक तत्व (Micro nutrients).-इनकी अल्प मात्रा में आवश्यकता पड़ती है, जैसे:-क्लोरीन, आयोडीन, ताँबा, मैंगनीज, कोबाल्ट, जिंक, लौह आदि।
खनिज लवणों की उपयोगिता (Utility of Mineral Salts) खनिज लवण अनेक उपापचयी क्रियाओं के लिए आवश्यक होते हैं। कुछ लवणा विभिन्न अंगों के निर्माण में आवश्यक होते हैं जैसे कैल्सियम तथा फॉस्फोरस दाँतों व हड्डियों के लिए अति आवश्यक हैं। लौह हीमोग्लोबिन (haemoglobin), साइटोक्रोम (cytochrome), मायोग्लोबिन (myoglobin) आदि का ‘महत्त्वपूर्ण घटक है। हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाता है। साइटोक्रोम श्वसन क्रिया में इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण में सहायक होता है। थाइरॉइड अन्तःस्रावी ग्रन्थि से थायरॉक्सिन स्रावण के लिए आयोडीन आवश्यक है। सोडियम तथा पोटैशियम पेशीय संकुचन एवं शिथिलन, तन्त्रिका आवेग संवहन आदि के लिएआवश्यक होता है।
(ii) जल तथा इसकी उपयोगिता (Water and itsUtility)-जल जीवद्रव्य का मुख्य भाग बनाता है। प्राणियों के शरीर में जल की मात्रा जैवभार का 45 से 85% तक होती है। प्रत्येक कोशिकीय क्रिया जल की उपस्थिति में ही होती है। जीवद्रव्य की सक्रियता जल की कमी के साथ कम होती जाती है। जल शरीरताप नियमन में सहायक होता है। जल के कारण ही रुधिर विभिन्न पदार्थों का परिवहन करता है। जल शरीर के अंगों को घर्षण के दुष्प्रभाव से बचाता है।
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