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BIOLOGY
डीएनए की अर्द्ध-संरक्षी प्रतिकृति की प्र...

डीएनए की अर्द्ध-संरक्षी प्रतिकृति की प्रक्रिया को विस्तार से लिखें।

लिखित उत्तर

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आनुवंशिक पदार्थ (DNA) का प्रतिकृतिकरण -वॉटसन तथा क्रिक ने DNA का जो प्रतिरूप प्रस्तुत किया था, उसकी एक विशेषता यह भी है कि इससे इस बात का तुरन्त अन्दाजा लगाया जा सकता है कि उसका प्रतिकृतिकरण किस प्रकार से हो सकता है। उनका विचार था कि DNA की दोनों शृंखलाएँ विकुण्डलित (uncoil) होकर अलग-अलग हो जाती हैं। प्रत्येक श्रृंखला एक टेम्पलेट या फर्मे या सांचे (tempelate) की तरह कार्य करती है। शृंखला पर लगे हुए कुछ नाइट्रोजननी क्षारकों में, कोशिका-द्रव्य में विद्यामान नाइट्रोजनी क्षारकों में से वही क्षारक आ लगते हैं, जो उनके पूरक होते हैं, अर्थात् शृंखला में यदि A है तो उसके सामने T भी आकर आबंधित हो सकता है, T के सामने A,C के सामने G,G के सामने C । इस प्रकार दोनों पुरानी श्रृंखलाओं के सामने उनके पूरक क्षार आबंधित हो जाते हैं जो जुड़कर नया DNA अणु बना लेते हैं। इस प्रकार, नये DNA अणु में एक श्रृंखला, जनक DNA की व एक नई श्रृंखला होती है। इस प्रकार DNA से दी DNA अणु बन जाते हैं। प्रतिकृतिकरण की ऐसी विधि को जिसमें एक श्रृंखला मानक से प्राप्त होती हैं, अर्ध-संरक्षी प्रतिकृतिकरण कहते हैं।
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