जब बन्द आर्गन पाइप के खुले सिरे के पास किसी ध्वनि स्रोत को रखते है तो उत्पन्न तरंग बन्द सिरे की और चलने लगती है। यह तरंग बन्द सिरे से परावर्तित होकर वापस लौटती है। आपतित तथा परावर्तित टर्निग के अध्यारोपण के फलस्वरूप बन्द आर्गन पाइप में अप्रगामी अनुदैर्घ्य तरंग उत्पन्न हो जाती है। खुले सिरे पर सदैव प्रसंद बनता है क्योकिं वहाँ पर वायु कण कम्पन करने के लिए स्वतंत्र होते है । जबकि बन्द सिरे पर निस्पंद बनता है क्योकिं बन्द सिरे पर वायु कण कम्पन के लिए स्वतन्त्र नहीं होते ।
चूँकि बन्द आर्गन पाइप में बन्द सिरे (दृढ सीमा) से परावर्तन होता है अतः अप्रगामी तरंग का समीकरण निम्न होगा
`y=-2"sin" (2pi x)/(lambda) "cos"(2pi vt)/(lambda) " "...(1)`
माना बन्द आर्गन पाइप का बन्द सिरा `x=0` तथा खुला सिरा `x=l` पर है । जहाँ l आर्गन पाइप की लंबाई है।
तब x=0 पर समी (1)से
तब x=l पर समी (1)से
`y=-2"sin" (2pi l)/(lambda)"cos" (2pi v t)/(lambda)`
`x=l` पर विस्थापन `` का मान अधिकमत होता है। अतः `"sin"(2pi l)/(lambda)` के मान को अधिकतम होना चाहिए अथार्त।
`|"sin" (2pi l )/(lambda)|=`
या `(2pi l)/(lambda)=(2K-1)(pi)/(2)`
जहाँ `K=1,2,3,4..`
उपयुर्क्त समी से,
`lambda=(4l)/(2K-1) " "...(2)`
`K=1,2,3,4...` इत्यादि कम्पन की पहली दूसरी, विधाओं के संगत है ।
कम्पन की पहली विधा यदि `K=1` के संगत वायु में उत्पन्न तरंग का तरंगदैर्घ्र `lambda_(1)` हो, तो समी (2) से,
`lambda_(1)=4l`
अतः उत्पन्न तरंग की आवृति
`n_(1)=(v)/(lambda_(1))=(v)/(4l)`
इसे मूल स्वरक या प्रथम कहते है।
स्पष्ट है, की `n_(1) prop (1)/(l)`
अतः बन्द आर्गन पाइप में मूल स्वरक की आवृति पाइप की लंबाई के व्युत्क्रमानुपाती होती है।
कम्पन की दूसरी विधि = यदि `K=2` के संग वायु स्तम्भ में उत्पन्न तरंग का तरंगदैर्घ्य `lambda_(2)` हो, तो समी (2) से,
`lambda_(2)=(4l)/(3)`
अतः उत्पन्न तरंग की आवृति `n_(2)=(v)/(lambda_(2))=(v)/(4l //3)`
`n_(2)=3(v)/(4l)=3n_(1)`
अतः इस स्थिति में उत्पन्न स्वरक की आवृति, मूल स्वरक की आवृति की तिगुनी होती है, इसे तृतीय सनादी या प्रथम अधिस्वरूप कहते है।
कम्पन की तृतीय विधा- यदि `K=3` के संगत उत्पन्न तरंगु का तरंगदैर्घ्य `lambda_(3)` हो तो समी (2) से
`lambda_(3)=(4l)/(5)`
अतः उत्पन तरंग की आवृति `n_(3)=(v)/(lambda_(3))`
`n_(3)=(v)/(4l //5)=5(v)/(4l)= 5nn_(1)`
कम्पन की इस विधा में उत्पन्न आवृति, मूल स्वरक की आवृति की पांच गुनी होती है। इसे पंचम सनादी या द्वितीय अधिस्वरक कहते है।
व्यापक रूप में कम्पन की `P` वी विधा में उत्पन तरंग की आवृति `n_(p)=(2K+1)P` इसे `(2p+1)` वां सनादी कहते है ।