ये शक्तियाँ पृथ्वी के अन्दर रहकर कार्य करती हैं, बाहर से दिखाई नहीं देती। इनकी उत्पत्ति पृथ्वी की सतह के नीचे गहराई में उपस्थित ताप से चट्टानों के फैलने सिकुड़ने व पृथ्वी के भीतर उपस्थित गर्म तरल पदार्थ मेंग्मा के स्थानान्तरण आदि के कारण होती है।
कारणों से उत्पन्न होती है । भूकम्प की तीव्रता के प्रभाव को किसी खास क्षेत्र में धन-जन की क्षति की मात्रा पर आधारित किया जाता है कोई भी भूकम्प, आपदा उस समय ही होती है जब वह किसी घने आबाद क्षेत्र में आता है। कभी-कभी साधारण भूकम्प भी आपदापन्न बन जाता है जब वह अन्य ज्वालामुखी-आंतरिक विवर्तनिक शक्तियों में ज्वालामुखी सबसे विचित्र घटना होती है। ज्वालामुखी के अंतर्गत लावा प्रवाह, लहर, पंकवाह, धूल, राख तथा विखण्डित पदार्थों के उद्भेदन जहरीली गैसों, धुआँ आदि बाहर निकलते हैं । इसे प्रकृति का सुरक्षा वाल्व भी कहा जाता है। ज्वालामुखी में जलवाष्प (80-90%) के अलावा कार्बन-डाई-ऑक्साइड, हाइड्रोजन,नाइट्रोजन गैसें होती है । इसके लावा से बने हल्के और छिद्रयुक्त शिलाखण्ड "प्यूमिस" कहलाते हैं । ज्वालामुखी छिद्र के चारों तरफ लावा के अत्यधिक मात्रा में जमाव होने पर ज्वालामुखी पर्वत का निर्माण होता है। इन पर्वतों के ऊपर लगभग बीच में एक छिद्र होता है, जिसे ज्वालामुखी छिद्र कहते है। ज्वालामुखी की उत्पत्ति इसलिए होती है क्योंकि पूरी पृथ्वी 17 ठोस टेक्टोनिक प्लेटों में विभाजित है, इसी कारण से ज्वालामुखी का उद्भव होता है। वस्तुतः ज्वालामुखी की, उद्भव वहीं होता है जहाँ पर दो प्लेटें या तो एक दूसरे के विपरीत या एक दूसरे की तरफ सरकती रहती हैं । ज्वालामुखी नाम की उत्पत्ति रोमन आग के देवता वालकैन के नाम पर हुई।
भूकम्प (Earthquake)-भूकम्प का आगमन पृथ्वी के आंतरिक भाग में तापीय दशाओं में परिवर्तन एवं विवर्तनिक घटनाओं के कारण होता है। भूकम्प वास्तव में विवर्तनिक बलों की शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। भूकम्प की तीव्रता तथा परिणाम का मापन रिक्टर मापक के आधार पर किया .जाता है। इस मापक की रचना चार्ल्स एफ. रिक्टर 1935 में की थी।भूकम्प की उत्पत्ति, पृथ्वी की क्रस्ट में असंतुलन तथा अव्यवस्था कई कारणों से उत्पन्न होती है भूकंप की तीव्रता के प्रभाव को किसी खास क्षेत्र में जन धन की की मात्रा पर आधारित किया जाता है कोई भी भूकंप आपदा उस समय ही होती है जब वह किसी घने आबाद क्षेत्र में आता है कभी कभी साधारण भूकंप भी आपदापन्न बन जाता है जब वह अन्य प्राकृतिक पर्यावरणीय प्रकर्मो आदि को तेज कर देता है भूकम्प के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष आपदापन्न प्रभावों के अंतर्गत निम्न को सम्मिलित किया जाता है-धरातलीय सतह में विरूपण, मानवकृत संरचनाओ (भवन,रेल,सड़क, पुल, बाँध, कारखाना आदि) की क्षति तथा विनाश, नगरों एवं शहरों का विनाश, मनुष्यों एवं जन्तुओं की मृत्यु, भीषण अग्नि, भूमि स्खलन, बाढ़ की स्थितियों अर्थात् जलभरों में व्यवधान एवं अव्यवस्था। 4 इकाई तक भूकम्प हल्के होते है। 5.5 तक प्रबल, 6 इकाई से ऊपर के भूकम्प विनाशकारी माने जाते हैं। 7 के ऊपर के भूकम्प सर्वनाशी होते हैं।
