(1) खड़ीन-खड़ीन मिट्टी का बना अस्थायी तालाब होता है जिसे किसी ढांलवाली भूमि के नीचे निर्मित करते हैं। इसके दो तरफ मिट्टी की दीवार (धौरा) तथा तीसरी तरफ पत्थर की मजबूत दीवार होती है । पानी की मात्रा अधिक होने पर खड़ीन भर जाता है और पानी अगली खड़ीन में चला जाता है जब खड़ीन का पानी सूख जाता है तो उसमें कृषि की जाती है।
(2) तालाब -राजस्थान में चर्षा जल संग्रहण की प्राचीन पद्धतियों में तालाब प्रमुख हैं। ये पुरुषों तथा स्त्रियों के नहाने हेतु अलग-अलग बने होते थे। तालाब की तलहटी पर कुआँ बना होता था जिसे बेरी कहते हैं। जल संचयन की यह प्राचीन विधि आज भी अपना महत्त्व रखती है तथा भूमि जल स्तर बढ़ाने का एक वैज्ञानिक आधार है।
(3)बावड़ी-राजस्थान में बावड़ियों का अपना स्थान है। ये जल संचयन की पुरानी तकनीक है बावड़ी में उतरने हेतु सीढ़ियाँ एवं तिबारे बने होते थे।
(4) झील-राजस्थान में प्राकृतिक एवं कृत्रिम दोनों प्रकार की झीलें पायी जाती हैं। झीलें वर्षाजल संग्रहण की अति प्राचीन पद्धति है झीलों से रिसने वाला पानी इसके नीचे स्थित जल स्रोतों जैसे कुएँ, बावड़ी, कुण्ड आदि का जलस्तर बढ़ाने में सहायक होता है।
(5) टोबा-थार के रेगिस्तान में टीबा जल संग्रहण का प्रमुख पारम्परिक स्रोत है । यह नाडी के आकार का होता है किन्तु नाडी से गहरा होता है ।
