मछलीपालन का महत्त्व निम्नलिखित हैं- (1) भोजन के रूप में -मछलियों का उपयोग स्वादिष्ट एवं अधिक पौष्टिक माँस प्राप्ति हेतु किया जाता है। (2) शरीर तेल-मछलियों से प्राप्त तेल स्नेहक, सौन्दर्य प्रसाधनों, पेन्ट एवं वार्निश के निर्माण में उपयोग किया जाता है। (3) औषधि के रूप में -मछलियों के यकृत निष्कर्षण द्वारा यकृत तेल प्राप्त होता है। इसमें विटामिन ए, सी, डी, ई की मात्रा पायी जाती है जो अभाव रोग के उपचार में औषधि का काम करती है। (4) मत्स्य त्वचा-मछलियों की त्वचा का उपयोग ताश के डिब्बे, आभूषणों के डिब्बे, जूते, स्त्रियों के लटकाने वाले विशेष पर्स आदि में किया जाता है। (5) रजताशल्क द्वारा मोती का निर्माण-फ्रांस में मछली के शल्कों का उपयोग कृत्रिम मोती निर्माण में किया जाता है। (6) उर्वरक के रूप में मछलियों के मरने के बाद इनका उपयोग उर्वरक के रूप में किया जाता है। इनको सुखाकर मत्स्य चूर्ण तैयार किया जाता है जिसका उपयोग तम्बाकू, चाय व कॉफी की खेती में उर्वरक के रूप में किया जाता है। मुर्गीपालन का महत्त्व-भारतवर्ष में मुर्गीपालन एक उत्तम व्यवसाय है। अण्डों को मानव के लिये सन्तुलित आहार का पूरक माना जाता है। इसमें कुपोषण का सामना करने की क्षमता होती है। मुर्गियों का मांस अधिक पोस्टिक एवं गुणकारी होता है। खेतों में उर्वरता को बढ़ाने के लिए मुर्गी की बीट की खाद उत्म मानी जाती है। बीट का प्रयोग मत्स्यपालन में मछलियों को भोजन देने में किया जाता है। इसमें मृदा में नाइट्रोजन यौगिकों की पूर्ति होती है, इसके अलावा मुर्गीपालन विकास ने गरीब, मध्यम वर्ग एवं अन्य को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये हैं।
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