परागण-चूँकि परागकणों में दृढ़ सुरक्षात्मक आवरण होता है, जो उन्हें सूखने से बचाता है। परागकण हल्के होते हैं, अतः वायु अथवा जल द्वारा बहाकर ले जाए जा सकते हैं। पुष्पों पर बैठने वाले कीटों के शरीर पर परागकण चिपक जाते हैं। जब कीट उसी प्रकार के किसी अन्य पुष्प पर बैठते हैं, तो पुष्प के वर्तिकान पर कुछ परागकण गिर जाते हैं।
इस प्रकार परागकणों का परागकोश से पुष्प के वर्तिकाग्र पर स्थानान्तरण .परागण. कहलाता है।
परागण के प्रकार-परागण दो प्रकार का होता है-
(क) स्व-परागण-जब परागकण परागकोश से उसी पुष्प के वर्तिकान पर गिरते हैं, तो इसे स्व-परागण कहते है
(ख) पर-परागण-जब पुष्प के परागकण उसी पादप के किसी अन्य पुष्प के वर्तिकान पर गिरते हैं, तो उसे पर-परागण कहते हैं।
